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मजदूर है हम

मजदूर है हम |
नहीं है हमें किसी बात का कोई गम |
अपने खून पसीने में भीगी दाल-रोटी खाते है हम |
ना आज की फिकर ना कोई भविष्य का रहता हमें मनन |
काम पर निकलने से पहले, करते ईश्वर का हम चिंतन |
बहुत ही साधारण सा लगता, सबको हमारा रहन-सहन |
रूखी सुखी खाकर भी,
बहुत सुकून भरा रहता हमारा जीवन |
हमारी मेहनत के बल पर ही,
उपयोग में लाते तुम सब कई संसाधन |
भले ही फुटपात पर बीत जाता, हम मजदूरों का जीवन |
हमारे दम पर ही होता शहरों में,
बड़ी-बड़ी इमारतों का आगमन |
सबको खुशियाँ बांटकर बहुत खुश होते है हम |
नहीं है हमें किसी बात का कोई गम |
मजदूर है हम |
मजदूर है हम ||
स्वरचित
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)

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