
मजदूर हूं मजदूर हूं,
घर से अपने दूर हूं,
देश का नूर हूं।
मजदूर हूं मजदूर हूं,
मेहनत का कोहिनूर हूं।
सूखी रोटी खाता हूं,
भारी वजन उठाता हूं,
मौसम से कभी नहीं घबराता हूं।
मजदूर हूं मजदूर हूं,
तकलीफों में भी खुश हो जाता हूं।
बिगड़ी मैं बनता हूं,
सबके काम आता हूं,
बंजर भूमि पर सोना मैं ही उगाता हूं।
मजदूर हूं मजदूर हूं,
बिना थके हर काम कर जाता हूं।
मंदिर मस्ज़िद बनाता हूं,
चर्च गुरुद्वारे जाता हूं,
धर्म से ऊपर उठकर अपना फर्ज निभाता हूं ।
मजदूर हूं मजदूर हूं,
बिना भेद भाव के,
सबका काम निपटाता हूं ।
ममता साहू कांकेर छत्तीसगढ़













