सारे अक्षर पढ़ती जा।
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सारे अक्षर पढ़ती जा।
आगे-आगे बढ़ती जा।।
शहरों में और गांव में
आज़ादी की छांव में
नए इरादे गढ़ती जा।
आगे-आगे बढ़ती जा।।
क्यों जुल्मों को सहती है
और क्यों पीछे रहती है
हर शोषण से लड़ती जा।
आगे – आगे बढ़ती जा।।
इन रूढ़िवादी चालों पर
हर शोषक के गालों पर
खूब तमाचे जड़ती जा।
आगे – आगे बढ़ती जा।।
ये जीवन तेरा बिगड़े ना
और तू जड़ से उखड़े ना
इतने गहरे गड़ती जा।
आगे- आगे बढ़ती जा।।
जो खोया है वो पाने को
घर से बाहर आने को
गिरती जा या पड़ती जा।
आगे- आगे बढ़ती जा।।
तू भारत की पीढ़ी है
ये शिक्षा की सीढ़ी है
इस सीढ़ी पर चढ़ती जा।
आगे – आगे बढ़ती जा।।
तू साधन कर ले रक्षा के
पंख लगा कर शिक्षा के
उड़ती जा बस उड़ती जा।
आगे – आगे बढ़ती जा।।
-विजय विश्वकर्मा
जबलपुर













