
मृदु उजाले में सजी दीपों की अवली,
आकाश के तारों से होड़ लेती,
लगती है जैसे धरती मां की ही सहेली।
घर घर में पूजन का हल्का सा कलरव,
आबाल वृद्ध में हंसी आनंद का सुभाव।
पकवानों की सुगंध मनभावन चहूँ ओर,
बच्चों की हंसी और पटाखों का शोर।
आनंद की बादलों का ना हो और छोर।
प्रत्येक मन में हो आनंद,हर घर में हो भोजन,
भूखा ना सोए कोई प्रभु,यह आनंद मिले चिरंतन।
सुलेखा चटर्जी













