
उठते हैं, अनुत्तरित प्रश्न कई!
कई, जिज्ञासाएं मचलती हैं ।
मानव अभिलाषाएं ही अक्सर!
नए अविष्कार करती हैं।
उलझते प्रश्नों के झंझावात
शांत कहां बैठने देते ।
नव-शाखों सम उठते विचार
मन- मस्तिष्क में द्वंद मचा देते।
निकल पड़ा सब संसाधन लेकर
फिर भी, ना मिला कोई हल।
सहसा ज्ञान की ज्योति हुई रोशन
रोप दिया उसको धरा पर।
ज्ञान अंकुर फूटेंगे इसमें !
उम्मीद लिए बैठा हूं।
प्रश्न -उत्तर की अभिलाषा में!
प्रश्नों से ही सिंचित करता हूं।
उत्तर की तलाश में जीवन
प्रश्नों के पीछे चलता है ।
पूरब से उगने के खातिर ही
सूरज पश्चिम में ढलता है।
स्वरचित :- उर्मिला ढौंडियाल’उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)












