Uncategorized
Trending

विज्ञानमय कोश


(आलेख)

विज्ञानमय कोश वेदांत दर्शन में वर्णित पंचकोशों में चौथा और अत्यंत महत्वपूर्ण आवरण है। इसका विस्तृत वर्णन तैत्तिरीय उपनिषद में मिलता है, जहाँ मनुष्य को पाँच स्तरों अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश से बना बताया गया है। विज्ञानमय कोश मन और आत्मा के बीच का सेतु है; यह बुद्धि, विवेक और आत्म-चेतना का केंद्र है। यह वह स्तर है जहाँ मनुष्य केवल सोचता नहीं, बल्कि समझता है।

उपनिषद् में विज्ञानमय कोश के विषय में कहा गया है—
“विज्ञानं यज्ञं तनुते, कर्माणि तनुतेऽपि च।”
अर्थात् विज्ञान (उच्च बुद्धि) ही यज्ञरूप जीवन का विस्तार करता है और समस्त कर्मों का संचालन करता है। यहाँ ‘विज्ञान’ का अर्थ आधुनिक विज्ञान नहीं, बल्कि सत्य को जानने वाली दिव्य बुद्धि है। यह कोश मनुष्य को यांत्रिक जीवन से ऊपर उठाकर चेतन जीवन की ओर ले जाता है।

विज्ञानमय कोश का आधार बुद्धि तत्त्व है। भगवद्गीता में बुद्धि की महिमा बताते हुए कहा गया है—
“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।” (गीता 2.50)
अर्थात बुद्धि से युक्त मनुष्य पाप और पुण्य दोनों से ऊपर उठ जाता है। यहाँ बुद्धि का तात्पर्य वही विज्ञानमय कोश है, जो कर्मों को बाँधने के बजाय मुक्त करने की क्षमता रखता है।

मनोमय कोश जहाँ भावनाओं और विचारों का क्षेत्र है, वहीं विज्ञानमय कोश निर्णय का क्षेत्र है। मन विकल्प देता है, पर अंतिम निर्णय बुद्धि करती है। कठोपनिषद् में शरीर को रथ, मन को लगाम और बुद्धि को सारथी कहा गया है—
“बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च।”
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि यदि बुद्धि जाग्रत है, तो जीवन-रथ सही दिशा में चलता है।

विज्ञानमय कोश केवल तर्क का क्षेत्र नहीं, बल्कि विवेक का केंद्र है, जहाँ सत्य और असत्य में भेद करने की क्षमता जाग्रत होती है। आदि शंकराचार्य कृत विवेकचूडामणि में कहा गया है—
“नित्यानित्यवस्तुविवेकः”
अर्थात नित्य और अनित्य वस्तुओं का भेद जानना ही विवेक है। यह विवेक विज्ञानमय कोश की ही देन है, जो मनुष्य को क्षणिक आकर्षणों से हटाकर शाश्वत सत्य की ओर मोड़ता है।

इस कोश का संबंध अहंकार से भी जुड़ता है, क्योंकि ‘मैं निर्णय ले रहा हूँ’ की भावना यहीं सक्रिय होती है। पर जब यह अहंकार शुद्ध होता है, तो वह कर्तापन छोड़कर कर्ता को ईश्वर मानने लगता है। गीता में कहा गया—
“निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।” (गीता 11.33)
अर्थात तू केवल निमित्त बन, यह अवस्था विज्ञानमय कोश की परिष्कृत स्थिति को दर्शाती है।

योग और ध्यान विज्ञानमय कोश को निर्मल बनाते हैं। जब मन शांत होता है, तब बुद्धि स्वच्छ दर्पण की तरह सत्य को प्रतिबिंबित करती है। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है—
“परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।”
जब मनुष्य कर्मों से प्राप्त लोकों की सीमाओं को समझ लेता है, तब उसकी बुद्धि वैराग्य की ओर मुड़ती है, यही विज्ञानमय कोश का जागरण है।

विज्ञानमय कोश का विकास केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं होता। उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है—
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।”
आत्मा केवल वाकपटुता, बुद्धि या अधिक श्रवण से नहीं मिलता, बल्कि अंतःशुद्धि से मिलता है। इसका तात्पर्य है कि विज्ञानमय कोश अनुभवजन्य ज्ञान से परिपक्व होता है।

जब यह कोश जाग्रत होता है, तब मनुष्य प्रतिक्रियाशील न रहकर जागरूक हो जाता है। वह परिस्थितियों में बहता नहीं, बल्कि उन्हें समझकर संतुलित उत्तर देता है। गीता के स्थितप्रज्ञ पुरुष का वर्णन इसी अवस्था को दर्शाता है—
“प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान्।” (गीता 2.55)
यह मन और बुद्धि के सामंजस्य की परिपक्व स्थिति है।

अंततः विज्ञानमय कोश आत्मा की ओर ले जाने वाला द्वार है। यह मनुष्य को बाह्य ज्ञान से आंतरिक ज्ञान की यात्रा पर ले जाता है। जब बुद्धि शुद्ध होकर आत्मा की ओर उन्मुख होती है, तब वह आनंदमय कोश में प्रवेश करती है। इसीलिए विज्ञानमय कोश को “विवेक का दीप” कहा गया है। ऐसा दीप जो जीवन के अंधकार को हटाकर आत्मप्रकाश की ओर मार्ग दिखाता है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *