
( गाँव का सबसे गहरा, सामूहिक पाप )
गुलनारी की परछाई जैसे ही हवा में घुली,
रात अचानक और भारी हो गई—
मानो आसमान का बोझ उतरकर
गाँव की छाती पर रख दिया गया हो।
लोग अपनी जगह जमे खड़े थे।
कोई हिल नहीं रहा था।
हर चेहरा राख-सा सफ़ेद।
हर साँस सूखी हुई।
गंगाराम ने धीरे से कहा—
“अब वो आएगा…
जिसका कोई नाम नहीं,
जिसकी कोई कब्र नहीं,
और जिसकी मौत का
आज तक कोई दोषी नहीं।”
रामशरण के होंठ काँप उठे—
“गंगा… ये कौन है?”
गंगाराम ने गहरी साँस ली—
“जिसके खून से
इस गाँव की नींव भीगी हुई है।”
सन्नाटा जो उठ खड़ा हुआ
चौपाल के बीच में रखे
टूटे हुए पत्थर का चबूतरा
हल्का-हल्का काँपने लगा।
ये वही चबूतरा था
जहाँ वर्षों पहले पंचायत लगाई गई थी
वो पंचायत
जिसने एक निर्दोष आदमी की बात सुने बिना
उसे ‘गुनहगार’ घोषित कर दिया था।
वो आदमी था—भोलाराम।एक मजदूर।जिसका कोई घर नहीं था,
कोई जमीन नहीं,कोई साहार नहीं।
वो सिर्फ भूख, मेहनत
और मजबूरी लेकर जीता था।
और उस दिन
उसकी एक ही गलती थी—
वह गलत समय पर
गलत जगह खड़ा था।
उसे चोर कहा गया,
दलाल कहा गया,
जाति का नाम लेकर
गाँव वालों ने उस पर थूका,
और उसे उसी चबूतरे के सामने
जिंदा जलाया गया।
लोग कहते रहे—
“ये गाँव की सुरक्षा के लिए ज़रूरी था।”
लेकिन असलियत यह थी—
भोलाराम किसी की साज़िश का शिकार था।
किसका?
ये राज आज तक किसी ने नहीं खोला।
और अब
उसी चबूतरे की दरारों से
धुआँ उठने लगा।
पहले काला,
फिर लाल,
फिर राख की तरह भूरा।
लोग पीछे हटे।
और धुएँ में
एक परछाई बनने लगी—
धीमी, भारी,
जैसे कोई मनुष्य नहीं
बल्कि सदियों का दुःख उठ खड़ा हुआ हो।
तीसरी परछाई : भोलाराम का धधकता हुआ चेहरा
धुआँ धीरे-धीरे
एक आदमी की आकृति में बदल गय
कठोर, धधकता हुआ,
जैसे उसके भीतर अब भी आग जल रही हो
जिसने उसकी देह खा ली थी।
महिलाएँ रो पड़ीं।
कुछ पुरुष पीछे हट गए।
एक युवक तो डर के मारे गिर पड़ा।
भोलाराम की परछाई
एक कदम आगे बढ़ी।
कोई आवाज़ नहीं—पर हवा में
जलती हुई चमड़ी की गंध फैल गई।
उसी गंध ने गाँव के कई बूढ़ों को
उनकी जवानी की वह रात
ताना-तानी से याद दिला दी।
रामशरण के गले में शब्द अटक गए—
“गंगा… ये… ये तो…”
गंगाराम ने मुँह फेर लिया—
“हाँ, रामू। ये भोलाराम है।
जो जिंदगी में सुना नहीं गया,
वह आज अपना सच कहने आया है।”
भोलाराम का मौन आरोप
भोलाराम की परछाई ने
अपनी राख-भरी उँगली
चौपाल पर बैठे बूढ़ों की ओर उठाई—
उन बूढ़ों की ओर
जो उस समय पंचायत के सरदार थे।
उनकी आँखें फैल गईं।
किसी के मुँह से बोल नहीं फूटा।
किसी ने आँखें झुका लीं।
गंगाराम ने कहा—
“यह किसी एक का नहीं…
पूरे गाँव का पाप था।”
एक बूढ़ा काँपते हुए बोला—
“हम… हमसे गलती हो गई थी…”
भोलाराम की परछाई
धीरे-धीरे उसके सामने गई।
बूढ़ा जमीन पर गिर पड़ा।
उसके शरीर में झटके उठे
मानो उसे वही रात
फिर से दिखाई दे रही हो—उसी आग की लपटें,उसी चीखें, उसी भीड़ के चेहरे।कोई भी उसे छूने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
*सच की आग फिर जली
परछाई ने चबूतरे की ओर देखा।
और अचानक—उस दरार से
एक हल्की,नीली-सी आग उठी।
कमज़ोर, पर सच्ची।
लोगों ने चीखना शुरू किया
“गंगा! ये आग तो खुद-ब-खुद…”
गंगाराम ने कड़क आवाज़ में कहा
“ये आग इंसाफ की है।
अब गाँव को
उस रात का हिसाब देना होगा।”
परछाई ने अपनी जलती हुई आँखें
भीड़ पर घुमाईं।
और तभी—उसकी आवाज़पहली बार सुनाई दी। धुआँ-सी भारी, कँपती,
पर साफ़—मेरी मौत का दोषी
कोई एक नहीं था…
पर शुरूआत
किसी एक ने ही की थी।”
लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा
शक, डर और इतिहास
सब मिलकर काँप रहे थे।
रामशरण ने पूछा
“गंगा… वह कौन था?”
गंगाराम ने चुप रहकर
लोगों की भीड़ को देखा।
फिर बोला—
“जिसने भोलाराम को जलाया,
वह अभी भी ज़िंदा है…
और यहीं खड़ा है।”
गाँव में आँधी की तरह हड़कंप मच गया।
सबकी नज़रें एक-दूसरे के चेहरों पर दौड़ने लगीं।
पर गंगाराम ने हाथ उठाकर कहा—
“भागने से सच नहीं बदलता।
तीसरी परछाई
किसी को नहीं छोड़ेगी।”
भोलाराम की परछाई
आगे बढ़ने लगी—धीरे-धीरे,
पूरे गाँव को देखते हुए।
और सभी समझ गए—अब अगला खुलासाकिसी की जिंदगी भी बदल सकता है,और शायद…किसी की मौत भी।
आर एस लॉस्टम












