
हवाओं ने इशारों से तुम्हें तो कुछ कहा होगा,
तुम्हारी नर्म-सी रूह को शायद छू गया होगा।
बहुत नाज़ुक हो—अभी तुमको ग़ज़ल भी कह न पाया,
मगर इक नाम लेकर दिल तुम्हें यूँ ही लिखा होगा।
किनारों पर भी किनारों का कोई पहरा रहा होगा,
तभी तो चाँद रातों में समंदर डर गया होगा।
तेरी अंगड़ाई के किस्से हवाओं में बिखरकर,
यकीनन फ़ासलों में आज मौसम बदल गया होगा।
बाग़ों में फूल गर महके, तो भँवरा रोज़ आता है,
रसों का मध्यपान करके कहीं पर लेट जाता होगा।
हुस्न हसीन है—लेकिन तेरा हुस्न ऐसी कशिश वाला,
तुझे देखकर कोई दिल फिर से मजबूर हुआ होगा।
लॉस्टम ने भी दुआओं में तुम्हारा नाम रखा होगा,
मोहब्बत की इसी मिट्टी में दिल फिर खिल गया होगा।
आर. एस. लॉस्टम












