
परिवर्तनशील समय बहुत कुछ दिखाता है,
स्वयं बदलता है और हमें बहुत कुछ सिखाता है।
जो मंजर कल था, वो आज नहीं है,
कुछ हमें सही लगता है और कुछ सही नहीं है!!
जिंदगी की किताब में हाशिये पर बैठी महिलाएं, अब सिर्फ और सिर्फ,ममतामयी माँ नहीं है।
जीवनसाथी के साथ कंधे से कंधा मिला
जीवन रूपी गाड़ी को भली भांति
वो खींचती है आज।
अपने जीवन को भी सहेजती,मन को भी
सींचती है आज।
अपनी नफा नुकसान की परवाह की बगैर
परिवार को वह कल भी समर्पित “थी”
आज भी समर्पित है।
जिंदगी से जूझते हुए अद्भुत बात उसने सीखी है,
” अपने लिए भी उसे वक्त निकालना है—–“
सुलेखा चटर्जी












