
पुराने, सुनसान मकान का दरवाज़ा
अचानक जिस गड़गड़ाहट से खुला था
उसने पूरे गाँव की रीढ़ में
डर की बर्फ़ सी बिछा दी।
वह मकान…
जिसके पास से बच्चे दिन में भी नहीं गुजरते। वह मकान…
जिसके बरामदे में
कभी पाँच दीये जलते थे
और आज पाँच दशक से
एक अँधेरा लगातार टंगा है।
गंगा ने रामशरण को इशारा किया।
दोनों उसी ओर बढ़े।
लोग दूर-दूर खड़े,
किसी की हिम्मत नहीं कि आगे आए।
१. मकान के भीतर—धूल, जाले और अतीत
दरवाज़े पर धूल की मोटी परत थी,
पर उसे भीतर से धक्का देकर खोलने वाला कोई दिखाई नहीं देता था।
हवा भारी। गंध पुरानी। दीवारें फूटी हुई, मानो उनमें भी कोई रो चुका हो।
गंगाराम ने लालटेन उठाई।
रोशनी दीवारों पर पड़ी
वहाँ समय की शिकायतें लिखी थीं।
काले धब्बे,
खरोंचें, और कुछ अजीब निशान,
जैसे कोई दीवार पर
नाखूनों से चढ़ने की कोशिश कर रहा हो। रामशरण फुसफुसाया—“ये वही मकान है ना…जहाँ चुन्नी काकी का परिवार आया था?”
गंगाराम ने सिर झुकाया—“हाँ…इसी मकान में उस रात की पहली चिंगारी पड़ी थी।”
२. वह कमरा… जहाँ कभी एक परिवार सोया था
दोनों आगे बढ़े।
एक कमरे का दरवाज़ा बंद था
बाहर से नहीं, अंदर से।
गंगा ने धीरे-धीरे उसे खोला।
जैसे किसी सोती हुई चीज़ को जगाना हो। कमरा भीतर से ठंडा था।
इतना ठंडा कि
लालटेन की लौ
दुबक गई।
दीवार पर एक पुरानी अलमारी थी,
उसके ऊपर धूल से ढँका एक
चुन्नी काकी, उनका पति,
और एक छोटी लड़की।
गंगाराम का दिल धड़क उठा।
उसने फोटो उठाया—
फ्रेम के पीछे कुछ लिखा था:
“जिस रात इस घर की आग बुझी,
उस रात हमारा नाम भी बुझा दिया गया।”
रामशरण के हाथ काँप गए—
“गंगा… ये किसने लिखा?”
गंगाराम की आँखें गहरी हो गईं—
“जो बचना चाहता था…
पर बच नहीं पाया।”
३. नीले कमरे का रहस्य
मकान के भीतर सबसे पीछे
एक छोटा कमरा था
जिसका दरवाज़ा
आधी सदी से बंद था।
दरवाज़े पर नीला रंग था
फीका, उखड़ा हुआ,
पर फिर भी नीला।
गाँव में कहा जाता था—
“नीला कमरा खोलेगा
तो रात जाग जाएगी।”
रामशरण सहमा हुआ—
“गंगा… इस कमरे को मत खोल।”
गंगाराम ने धीरे से कहा—
“रात तो पहले ही जाग चुकी है, रामू।
अब सच को भी उठना होगा।”
उसने दरवाज़े को धक्का दिया
पहले हल्का… फिर जोर से।
दरवाज़ा चरमराया
और धीरे-धीरे खुल गया।
कमरे के भीतर—
दीवारें नीली थीं,
लेकिन उनमें जगह-जगह
काले धुएँ के निशान थे,
जैसे आग दीवार तक चढ़ गई हो।
फर्श पर एक
जली हुई लकड़ी की डंडी पड़ी थी—
मानो उस रात
किसी ने आखिरी बार
बाहर निकलने की कोशिश की हो।
और फिर…
गंगाराम की नज़र दीवार के बीचों-बीच पड़ी
एक बड़े, काले, उभरे हुए नाम पर गई।
यह नाम धुएँ और खरोंच से लिखा गया था—किसी ने पूरी ताकत से
अपनी आखिरी सांसों में
इसे उकेरा था।
लालटेन काँप उठी।
कमरा ठंडा हो गया।
रामशरण ने डरकर पूछा—
“कौन सा नाम लिखा है, गंगा…?
किसका नाम?”
गंगाराम ने काँपती आवाज़ में पढ़ा
“धरमवीर सिंह…”
रामशरण का चेहरा फक पड़ गया।
भीड़ में खड़े लोगों में हलचल मच गई।
“धरमवीर सिंह?
मुखिया का बाप?
गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था वो!”किसी ने थरथराती आवाज़ में कहा—तो… चुन्नी काकी को…
धरमवीर सिंह ने…?”
गंगाराम ने सिर उठाया—
आँखों में गहरी, भारी सच्चाई थी।
“हाँ…उसी ने जलाया था।
उसी ने आधी रात में आग लगवाई थी। और उसी ने
गुड़िया वाली बच्ची को भी
उस आग में… छोड़ दिया था।”
भीड़ में सन्नाटा।
वह मकान जैसे चीख उठा।
मानो दीवारें भी बोल पड़ी हों—
“हमने देखा था…
हमने सुना था…”
अचानक कमरे के कोने से
ठंडी हवा का झोंका आया
और दीवार पर लिखा नाम
हल्की रोशनी में चमकने लगा—
“धरमवीर सिंह…”
रामशरण फुसफुसाया—
“लेकिन… धरमवीर तो
25 साल पहले मर गया था
गंगाराम ने पीछे हटते हुए कहा “हाँ…
वो मर गया था। पर उसके पाप…
आज भी जिंदा हैं। और वह…
जिसे उसने जलाया था…
अब उसका नाम लेने लगी है।”
लालटेन अचानक बुझ गई।
अंधेरे में किसी की बहुत धीमी,
बहुत ठंडी आवाज़ गूँजी
“एक नाम और है, गंगा
आर एस लॉस्टम












