भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी – एक प्रचारक, सहृदयी मनुष्य, संवेदनशील राजनेता और करुणामय प्रधानमंत्री
“जहाँ सब खाते हैं, वहीं मैं भी” (1953–54)
प्रचारक जीवन के शुरुआती वर्षों में, एक बार यात्रा के दौरान अटल जी को रात में पूर्वी भारत के एक दूरस्थ रेलवे स्टेशन पर उतरना पड़ा। न ठहरने की व्यवस्था थी, न भोजन की। स्टेशन पर कुछ श्रमिक अपने लिए साधारण रोटियाँ बाँट रहे थे। अटल जी बिना किसी औपचारिकता के वहीं बैठ गए और वही भोजन स्वीकार किया। जब किसी ने कहा कि वे चाहें तो अलग व्यवस्था हो सकती है, तो उन्होंने सहज भाव से कहा, “जहाँ सब खाते हैं, वहीं मैं भी खाऊँगा।” यह सामाजिक समरसता का सहज अभ्यास था।
“दो रोटियाँ और आत्मसम्मान” (1954–55)
इसी प्रचारक काल में, ग्वालियर-कानपुर क्षेत्र में प्रवास के दौरान, उन्होंने एक विद्यार्थी को देखा जो नियमित बैठकों में आता था, पर लगातार दुर्बल होता जा रहा था। कारण पूछने पर पता चला कि आर्थिक तंगी के कारण वह अक्सर भोजन छोड़ देता है। अटल जी ने कोई उपदेश नहीं दिया। वे चुपचाप हर शाम अपने हिस्से की रोटियाँ लेकर उसके पास पहुँचने लगे। महीनों तक यह क्रम चला। वर्षों बाद वही विद्यार्थी कहा करता था कि अटल जी ने उसे केवल भोजन नहीं, जीवन का आत्मविश्वास दिया।
“डंडे नहीं, संवाद” (1964–65)
जनसंघ काल में, उत्तर भारत के एक विश्वविद्यालय नगर में छात्र आंदोलन उग्र हो रहा था और पुलिस लाठीचार्ज की तैयारी में थी। अटल जी वहाँ पहुँचे, प्रशासन से बात की और स्पष्ट शब्दों में कहा, “ये अपराधी नहीं, देश का भविष्य हैं।” उनके हस्तक्षेप से लाठीचार्ज टल गया और संवाद के माध्यम से समाधान निकला।
“आलोचक भी पहले मनुष्य” (1986–87)
विपक्ष में रहते हुए, वर्षों तक उनकी तीखी आलोचना करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार जब गंभीर रूप से बीमार पड़े और दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती हुए, तो अटल जी अकेले उनसे मिलने पहुँचे। कोई राजनीतिक चर्चा नहीं हुई। बस इतना कहा, “आपने जो लिखा, वह आपका धर्म था।” इस मुलाकात को पत्रकार ने बाद में जीवन का सबसे मानवीय क्षण बताया।
“नाम नहीं, सम्मान ज़रूरी” (1978–79)
विदेश मंत्री के रूप में कार्यकाल के दौरान, उन्हें ज्ञात हुआ कि मंत्रालय का एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अपनी बेटी के इलाज के लिए घरेलू सामान बेच रहा है। अटल जी ने निजी धन से सहायता भिजवाई और स्पष्ट निर्देश दिया, “नाम मत बताना, सम्मान बचना चाहिए।” यह सत्ता में रहते हुए भी करुणा की गरिमा थी।
“आधी रात का अपनापन” (1999)
प्रधानमंत्री रहते हुए, एक पुराने कार्यकर्ता के पुत्र के आकस्मिक निधन की सूचना मिलने पर अटल जी ने आधी रात स्वयं फोन किया। उन्होंने औपचारिक संवेदना नहीं, बल्कि दुःख की साझेदारी दी। परिवार के लिए यह पल जीवन भर की स्मृति बन गया।
“कर्तव्यपथ पर भी दीपावली” (2001)
दीपावली के अवसर पर, देर रात तक बैठकों के बाद, प्रधानमंत्री अटल जी ने निर्देश दिया कि ड्यूटी पर तैनात सुरक्षा कर्मियों को मिठाई और चाय दी जाए। उन्होंने स्वयं पैकेट भिजवाए। एक जवान ने भावुक होकर कहा, “पहली बार लगा कि प्रधानमंत्री हमारी थकान समझते हैं।”
इन सभी घटनाओं में अटल बिहारी वाजपेयी जी का वास्तविक व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है – जहाँ सत्ता कठोर नहीं बनाती, आलोचना कटु नहीं करती और शक्ति करुणा को दबा नहीं पाती। प्रचारक से प्रधानमंत्री तक की उनकी यात्रा यह सिखाती है कि राष्ट्रनिर्माण का सबसे मजबूत आधार मानवता, शिष्टता और मर्यादा ही है।
आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए यही कहना उचित होगा कि अटल जी केवल एक महान नेता नहीं थे, बल्कि मानव मूल्यों की जीवंत पाठशाला थे, और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
संपादक
डॉ धर्मप्रकाश वाजपेयी
सिविलसेवा गुरु












