
मैं कुछ भी नहीं, बस तुम्हें सोच रहा हूँ,
हर एक साँस में ख़ुद को सोच रहा हूँ।
हर ख़याल की शुरुआत तुम से ही है,
हर ख़याल का आख़िरा सोच रहा हूँ।
जहाँ शब्द थक कर ख़ामोश हो जाते हैं,
वहीं तुम्हारी मौजूदगी सोच रहा हूँ।
न रास्ते बदलता हूँ, न मंज़िलें पूछता हूँ,
हर मोड़ पे बस तुम्हें सोच रहा हूँ।
यादें जो कभी बोझ बन के उतर आती हैं,
तुम्हारा नाम लेकर हल्का सोच रहा हूँ।
न जवाब की चाह है, न सवालों की प्यास,
मैं ख़ुद को तुम्हारे भीतर सोच रहा हूँ।
आर एस लॉस्टम












