
बदलते वक्त की धुन पर,
लिए पहचान चलते हैं,
हम राजा भोज के वंशज हैं,
लिए स्वाभिमान चलते हैं।
उसी गौरव की गाथा में,
हम सीना तान चलते हैं।
धारा नगरी के नभ में वो,
विद्या के जो सागर थे,
राजा भोज के चरणों में,
हम सभी सम्मान रखते हैं।
कलम हाथ में उनके,
शस्त्र भी शोभित होते हैं।
अद्भुत उनकी माया थी,
न्याय शीतल छाया थी।
भोजपुर के शिवालय भी,
उनकी गाथा गाते हैं।
ज्ञान की ज्योति जला करके,
जग को राह दिखाते हैं।
हम राजा भोज के वंशज हैं,
स्वाभिमान से जीते हैं।












