
युद्ध नही संवाद चाहिए,इक बार नही हर बार चाहिए।
यह जो तुम हो रूठ हो जाते इस आदत से निजात चाहिए।।
तुम मेरे कोई चाँद नही हो जो कि बस सिर्फ रात चाहिए ।
हो मेरे तुम आफताब से , साथ को हर पल हर हाल चाहिए।।
हाँ शायद तुम्हे नही जरूरत ; पर मुझे तो जीने को श्वास चाहिए।
चाहों जो तुम छोड़ के जाना ; फिर न जीने की आस चाहिए।।
जैसे जरूरत नीर की नद को और धरती को आसमान चाहिए।
वैसे हो तुम तड़प प्रेम की और मुझको हर श्वास चाहिए।।
अतृप्त की क्षुधा को शांत जो कर दो ऐसी तृप्ति न संताप चाहिए
होगी आदत जिस्म को भूख सी पर रूह को रूह का साथ चाहिए।।
युद्ध मे मौत गौण है होती और मुझे मौन न संवाद चाहिए ।
बहुत रूठ ली अब तुम मुझसे अब न यह क्लांत चाहिए।।
बोलो कुछ न भले ही चुप रह , ख़ामोशी का भी एहसास चाहिए
बोलो तो भी आलिंगन प्रेम सा ऐसा मधुर एहसास चाहिए।।
युद्ध नही संवाद चाहिए , और इक बार नही ; हर बार चाहिए।।
संदीप शर्मा सरल












