
“हिन्दी मेरे शब्दों की ,ये भाषा विशेष है।
शब्दों का ऐसा भाव , ये समांजस्य अशेष है।
हिन्दी मेरी मां की ,युही लोरियों की धुन है।
हिन्दी मेरी बचपन की, यादों की धुन है।
सागर में मिलती धाराएं, रूप एक है।
वैसे ही मेरी हिंदी के, रूप अनेक हैं।
भाषा में मेरे प्रेम का वात्सल्य विशेष है।
ये हिन्द की बिन्दी है,में हिंदी विशेष है।
हो भावना या भाव हो, शब्दों की ललाक है।
ये हिन्दी भाषा मेरी, लय प्रबल है।
इतिहास गढ़ रहा हूं,मेरी भाषा जीवंत हे।
मैं भी पढ़ा हूं हिन्दी तो, साहित्य जीवंत हे।
शब्द रूप चरित्र निर्माण,सब हिन्दी से किया।
मैंने विकास मेरे चित्त का , हिन्दी से किया।
हिन्दी मेरे शब्दों की ,ये भाषा विशेष है।
शब्दों का ऐसा भाव , ये समांजस्य अशेष है।
लेखिका कवियत्री नीतू नागर अम्बर नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश












