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ईश्वर की कृपा, सरस्वती का वास

निज स्वार्थ त्याग कर जिसने
औरों का हित करना चाहा,
जग में उसके लिये कुछ कठिन
नहीं उस पर प्रभू की है छाया,
जो निज मन में परहित कर्म
करने की भावना रखते हैं,
ईश्वर सदैव उनके मन, वाणी
और कर्म में बसते हैं,
जटायू ने परहित कर्म कर
सीता माँ की रक्षा में प्राण दिए,
अंततः उनकी मुक्ति हेतु
परबृहम प्रभु श्रीराम स्वयं आए।

जिसका केवल तन ही नहीं,
मन भी निर्मल होता है,
छल कपट त्याग करने वाले
का ईश्वर से सच्चा नाता है।
मनुष्य का शान्त चित्त ही
अंततोगत्वा वह हथियार है,
जो आने वाली किसी भी
चुनौती को झेल सकता है।

विद्यार्थी जीवन की यह शिक्षा विद्वान
शिक्षकों की आज याद दिलाती है,
अगर कोई एक पुस्तक लिख लेता है,
तो उसे पुत्ररत्न जैसी प्राप्ति होती है।

कितना सत्य कथन वह अब लगता है,
जब मैने एक पुस्तक लिख डाली है,
पुत्र पुत्री रत्न दिए हैं ईश्वर ने स्वयं,
कविताधर्मिता माँ सरस्वती ने दी है।

अपनों परायों का जीवन शत वर्ष
या उसके आस पास होता होगा,
कविता रूपी पुस्तक-पुत्र प्रकृति
के अंत तक जग में व्याप्त रहेगा।

आप सरस्वती कृपा के वरद हस्त हो,
कविता कृति पटुता में सिद्धहस्त हो,
अंबर पर जब तक सूरज चाँद रहेगा,
आदित्य आपकी कविता का नाम रहेगा।

यह सब लिखकर एक सुधी मित्र ने
कविता लिखने के लिये प्रशंसा की,
अमृतपान समान कविता जीवन भर
सारे जग को निरंतर प्रोत्साहन देगी।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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