
चलते रहना राही तू चलते रहना ,
कभी चोट लग जाए तब भी बढ़ते रहना ।
गिरना तू संभलना तू फ़िर कदम बढ़ाना
राही तू ठोकरों से सीखते रहना ।
ईर्ष्या का भाव न मन में आने देना ,
विनम्र रहना मन निष्ठुर न बनने देना ।
आत्ममुग्ध हो भी गए तो सम्भल जाना,
राही तू ठोकरों से सीखते रहना ।
जीवन में आई कटुता को है मिटाना ,
इसी क्षणों में अपनी शक्ति को बढ़ाना ।
आहत नहीं होना है स्वयं को समझना ,
राही तू ठोकरों से सीखते रहना ।
श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़












