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अंतिम ख़्वाहिश

पहली ख़्वाहिश कोई भी हो, बदलती रहती है,
आख़िरी ख़्वाहिश में ही इंसान ज़िंदा रहता है।

बचपन में खिलौने, जवानी में पहचान चाही,
फिर एक दिन सिर्फ़ प्रेम ही सपना रहता है।

मिला नहीं वो प्रेम, मगर असर ऐसा छोड़ा,
कि टूटकर भी दिल किसी में ज़िंदा रहता है।

लोग कहते हैं मोहब्बत आदमी को पागल करे,
हमें ख़बर है—इसी में होश अपना रहता है।

दुनिया जिनको छोड़ दे, वक़्त जिनसे रूठ जाए,
प्रेम उनके लिए ही अक्सर सहारा रहता है।

न उम्र बाँध सके उसे, न आग जला पाए,
प्रेम हर हाल में सीमा से परे रहता है।

राजाओं ने तख़्त जीते, जंगों ने सरहदें,
मगर दिलों पर सिर्फ़ मोहब्बत का क़ब्ज़ा रहता है।

न क़ानून रोक पाए, न दूरी, न ज़माना,
जहाँ प्रेम सच हो, वहाँ रास्ता रहता है।

प्रेम को बस प्रेम ही झुका सकता है,
वरना यह इश्क़ हर डर से ऊँचा रहता है।

मरते वक़्त बस इतनी सी ख़्वाहिश थी दिल की—
कि सीने में कोई नाम ज़िंदा रहता है।

जो प्रेम के साथ मरे, वो मरता नहीं ,
वो हर युग में किसी की कहानी रहता है।
आर एस लॉस्टम

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