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जनक जननी

मात-पिता से ना कोई बढ़कर,
नहीं किसी को हमने जाना,
थाम के उंगली चलना सिखालाया,
आगे बढ़ना संभालना सिखलाया।।

एक-एक धागे को सुलझा कर ,
गांठ उलझनो को हटाकर ,
कलियों सा खिलना सिखलाया,
कांटों पर चलना बतलाया।।

पत्थर से मत भागो अकुला कर,
बैर न साधों नैन चुरा कर,
दीप जलाकर हरो अंधेरा,
निसिदिन आए नया सवेरा।।

सुख दुख है जीवन का खेला,
मात-पिता संग खुशियों का मेला,
पलकों में है उज्जवल सपना,
सारा जग लगता है अपना।।

धूप बढ़ी जब-जब जीवन में,
बादल बन कर छाते है,
अमृत बनकर प्यास बुझाते ,
पीड़ा क्रय कर जाते हैं।।

पत्थर को पत्थर न समझों
वन कुंजन कहलाते हैं ,
तपती जेठ दोपहरी में भी,
बासंती बन जाते हैं।।

आंगन महके जग सज जाये,
भंवरे देखो गुनगुन गाये,
मात पिता का साथ मिला तो,
घिरी बदली भी छट जाये ।।

करो ना मात-पिता से बरजोरी,
कभी न उलझेगी जीवन डोरी,
सरल स्वभाव सु मधुर है बोली,
भरते हैं खुशियों से झोली।।

रजनी कुमारी
लखनऊ,उत्तर प्रदेश

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