लौ बनकर आई लोहड़ी
अलाव के बीच खड़ी है लोहड़ी,
हथेलियों में सूरज थामे।
ठिठुरती रात के माथे पर
उसने आग से कुमकुम बाँधे।
मकई के दानों में
किसानों की हँसी झनकती है,
तिल-गुड़ की मिठास में
साल भर की थकान पिघलती है।
ढोल की थाप नहीं,
यह तो धरती की धड़कन है,
हर चिंगारी में
आने वाली फसल का सपना है।
लोहड़ी कहती है—
जो जला, वही उजला हुआ,
जो बाँटा, वही सहेजा गया,
जो झुका, वही अगला हुआ।
आज आग नहीं जलती केवल,
आज पुरानी पीड़ा जलती है,
कल की रोटी, अगले गीत की
बीज-सी चुपचाप पलती है।
सबके चेहरों पर खिलती है।।
शिक्षिका, कवयित्री, लेखिका, समाजसेविका-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)












