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ग़ज़ल

बातों में जब खींचातानी।
कहना- सुनना है बेमानी।

वो आगे, हम पीछे कैसे,
सोच हमारी है बचकानी।

जैसा बोया, काटा वैसा,
फिर इसमें कैसी हैरानी।

जीती बाजी हार गए तो,
शर्म से होते पानी-पानी ।

वो ही न हो पाए अपने,
रक्खी जिनसे आना-कानी।

हाल छुपाकर हमअपनों के,
करते औरों की निगरानी।

नवीन माथुर पंचोली

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