
बातों में जब खींचातानी।
कहना- सुनना है बेमानी।
वो आगे, हम पीछे कैसे,
सोच हमारी है बचकानी।
जैसा बोया, काटा वैसा,
फिर इसमें कैसी हैरानी।
जीती बाजी हार गए तो,
शर्म से होते पानी-पानी ।
वो ही न हो पाए अपने,
रक्खी जिनसे आना-कानी।
हाल छुपाकर हमअपनों के,
करते औरों की निगरानी।
नवीन माथुर पंचोली












