
उत्तरायण का उत्सव
आज सूरज ने
दक्षिण की थकान उतार दी,
उत्तर की राह पर
उम्मीद की गठरी बाँध ली।
तिल-गुड़ की मिठास में
घुल गया बीता कल,
कड़वाहट ने
आज मौन व्रत ले लिया।
पतंगों ने
आसमान से पूछा—
क्या अब सपने
ऊँचा उड़ सकते हैं?
नदियों ने
अपने किनारों से कहा—
अब रुकना नहीं,
अब बहाव शुभ है।
यह संक्रांति
सिर्फ तिथि नहीं,
यह तो जीवन का संकेत है—
अंधकार से
प्रकाश की ओर
चुपचाप बढ़ जाने का।
अंतर्मन की पुकार का,
स्नेहमयी गुहार का।
सबको बधाई देने की,
है हमारी भारतीय रीत,
मिलकर गाएँ स्नेह भरे गीत,
यही तो है जीने की रीत।
आज के पावन और विशेष पर्व की बड़े गर्व से बधाई और हार्दिक शुभकामनाएंँ
कवयित्री -डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)












