
कुछ आग-सी जलती रहती है,
मेरे भीतर यह सब होता है।
उसकी आँखों की ख़ामोशी में,
मुझसे कुछ बे-लब होता है।
उसकी हल्की-सी हँसी आकर
दिन की थकन हर लेती है,
लंबी धूप के सन्नाटे में
जैसे कोई शब होता है।
मैं उसे हर छोटी बात में
अनजाने ही ढूँढ लेता हूँ,
हवा चले या शाम ढले
उसका ही सब होता है।
मैं जानूँ यह सिर्फ़ वहम है,
दिल फिर भी सच मान लेता है,
हर इक ख़्वाब की दहलीज़ पर
उसका ही हक़ होता है।
मैं पाना नहीं, खोना नहीं,
बस पास-सा रहना चाहूँ,
प्रेम जहाँ कोई माँग नहीं
बस महसूस-सा होता है।
जब वह घर में आती है,
वक़्त ठहर-सा जाता है,
शब्द गुम हो जाते हैं
और मौन मुख़ातिब होता है।
वह छुए बिना भी छू लेती है,
इतना असर रखती है,
मेरे भीतर का सारा जहाँ
उससे ही लबरेज़ होता है।
डर लगता है यह सोच कहीं
हद से आगे न बढ़ जाए,
पर भीतर की इस आग से ही
मेरा होना होता है।
अधूरा होकर भी यह प्रेम
पूरी उम्र साथ रहता है,
जो कह न पाया शब्दों में
वही तो शाश्वत होता है।
आर एस लॉस्टम












