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बात लिखती हूँ

“जब भी खुश रहूँ, तो मीठे एहसास लिखती हूँ,
खामोश लबों से अनकही बात लिखती हूँ।

यूँ तो सारा जहाँ है लिखने को मेरे पास,
पर फुर्सत के लम्हों में कुछ खास लिखती हूँ।

शायरी का कोई शौक या आदत नहीं मुझे,
बस कविताओं में अपने दिल की बात लिखती हूँ।

क्या महसूस करती हूँ, ये खुद नहीं जानती,
पर जो भी महसूस करूँ, वो हर जज़्बात लिखती हूँ।

ज़रूरी नहीं कि जो लिखूँ वो हर बात सही हो,
कभी हकीकत, तो कभी कल्पनाओं का संसार लिखती हूँ।

लोग पूछते हैं कि कैसे लिख लेती हो ये सब?
मैं कहती हूँ—जो मन में आए, वो बेहिसाब लिखती हूँ।

खैर,
“खैर, कोई इसे कविता कहे या महज़ कुछ टूटे हुए शब्द,
मैं तो बस कागज़ पर अपने दिल की मुलाक़ात लिखती हूँ।”

खुशी में खुशी, और उदासी में गम की बातें,
मैं जिस रंग में रहूँ, बस वही रंग मे बात लिखती हूँ।”

स्नेहा कुमारी
धनबाद, झारखंड

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