
जब थककर बैठ गया मन
और रास्ते धुंधले लगने लगे,
जब अपने ही सवाल बनकर
खुद से दूर होने लगे,
तभी भीतर से एक आवाज़ आई—
धीमी, मगर सच्ची थी,
कहा, “अभी कहानी बाकी है,
ये चुप्पी अंतिम नहीं थी।”
नई उम्मीद कोई सपना नहीं,
जो आँख खुलते ही टूट जाए,
वो तो वो ज़िद है
जो गिरकर भी फिर उठ जाए।
वो सिखाती है
कि हार का मतलब रुकना नहीं,
हर ठहराव के पीछे
एक नई चाल छुपी होती है कहीं।
जब कल बोझ बनकर
सीने पर टिक जाता है,
तब उम्मीद उसे अनुभव बनाकर
आगे बढ़ना सिखा जाता है।
न वो शोर मचाती है,
न खुद को साबित करती है,
वो बस मुश्किल घड़ी में
चुपचाप साथ चलती है।
सूखी हुई हिम्मत में
वो भरोसे की नमी भरती है,
और टूटे आत्मविश्वास को
धीरे-धीरे संवारती है।
नई उम्मीद कहती है—
“डर सबको लगता है,
मगर वही आगे बढ़ता है
जो डर के साथ चलता है।”
हर अंधेरे में
वो रोशनी खोज लेती है,
छोटे-छोटे कदमों से
बड़ी मंज़िल रच लेती है।
यह उम्मीद साँसों जैसी है,
जब तक जीवन है, तब तक है,
इंसान चाहे टूट जाए,
पर उम्मीद कभी खत्म नहीं होती है।
नाम-पल्लवी पटले
जिला-सिवनी, मध्यप्रदेश












