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अँधेरी सुरंग का द्वार


पहाड़ी के ऊपर से उठी दूसरी कराह
पहली से कहीं ज़्यादा दर्दनाक थी।
ऐसा लगा जैसे बरसों से सिला हुआ कोई घाव
अचानक फट पड़ा हो।
लोग सिहर उठे।
किसी की रीढ़ में ठंड उतर गई,
किसी के मुँह से शब्द ही नहीं निकले।
राशिरण ने घबराकर गंगाराम का कंधा पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“गंगा…
ये आवाज़ इंसान की नहीं है…”
गंगाराम की नज़र ऊपर उठी।
वह सिर्फ़ सुन नहीं रहा था—
वह महसूस कर रहा था।
कुछ पुराना,
कुछ दबा हुआ,
कुछ ऐसा जो मरा नहीं था—
बस ज़मीन के नीचे धकेल दिया गया था।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“ये आवाज़ शरीर की नहीं है, राशिरण।
ये आवाज़ सच की है।”
भीड़ में बेचैनी फैल गई।
कुछ लोग पीछे हटने लगे,
पर गंगाराम आगे बढ़ता चला गया—
मानो वह कराह उसे अपने भीतर बुला रही हो।
पहाड़ी के किनारे,
पत्थरों के बीच
एक संकरी दरार थी—
इतनी संकरी कि अब तक
किसी ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया था।
गंगाराम वहीं रुक गया।
“यही है वो जगह,” उसने कहा।
“यहीं से आवाज़ उठी थी।”
राशिरण हड़बड़ा गया।
“पर ये तो गुफ़ा जैसी है!
गंगा, अंदर मत जा… पता नहीं क्या—”
गंगाराम ने उसे बीच में ही रोक दिया।
“हर सच की एक सुरंग होती है, राशिरण।
ऐसी जगह जहाँ इंसान नहीं उतरता—
पर पाप और परछाइयाँ
खुद रास्ता बना लेती हैं।”
उसने लालटेन जलाई।
इस बार लौ काँप रही थी,
मानो वह भी भीतर जाने से डर रही हो।
चारों ओर सन्नाटा था।
सिर्फ़ हवा की सरसराहट
और पहाड़ी से आती वह अनजानी कराह।
गंगाराम झुककर सुरंग में उतरने लगा।
राशिरण घबरा गया।
“मैं भी चलूँगा!”
गंगाराम ने सिर हिलाया।
“नहीं।
कुछ रास्ते अकेले तय करने पड़ते हैं।
तुम आओगे तो
तुम्हारा डर
मेरे रास्ते को भारी कर देगा।”
राशिरण एक क़दम पीछे हट गया।
उसकी आँखों में डर वहीं ठहर गया।
गंगाराम लालटेन हाथ में लिए
सुरंग के भीतर उतर गया।
सुरंग के भीतर
जैसे किसी और ही दुनिया का दरवाज़ा खुल गया हो।
नमी से भीगी दीवारें।
अँधेरा इतना गाढ़ा
कि लालटेन की रोशनी भी सहमी हुई लगे।
पैरों के नीचे सूखी पत्तियाँ चरमराईं—
हर क़दम पर
जैसे कोई फुसफुसा रहा हो।
कुछ आगे दीवार पर
नाख़ूनों के निशान थे—
गहरे, बेतरतीब।
मानो किसी ने आख़िरी साँसों में
बाहर निकलने का रास्ता
नाख़ूनों से ढूँढा हो।
गंगाराम की साँस भारी हो गई।
“तो…
किसी को यहाँ बंद किया गया था,”
वह बुदबुदाया।
अचानक दीवारों से
एक धीमी आवाज़ उभरी—
“गंगा…”
उसका खून ठंडा पड़ गया।
उसने लालटेन ऊपर उठाई—
कोई नहीं था।
फिर वही आवाज़—
“तू… लौट क्यों आया…?”
काँपती आवाज़ में गंगाराम बोला—
“क्योंकि सच
किसी को अधूरा छोड़कर
कभी लौटता नहीं।”
अँधेरा और गहरा हो गया—
जैसे सुरंग
उसकी बात समझ रही हो।
तभी कोने से
हल्की-सी हरकत हुई।
गंगाराम ने लालटेन घुमाई।
वहाँ पूरी देह नहीं थी—
पर देह का अभाव भी नहीं।
एक धुँधली आकृति,
सिर झुका हुआ।
चेहरा ऐसा
मानो कभी आग ने छू लिया हो।
और गले में—
वही काली चूड़ियों की टूटी माला।
गंगाराम बुरी तरह काँप गया।
उसके मुँह से नाम फिसल पड़ा—
“चुन्नी… काकी…?”
परछाईं ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी आँखें खाली थीं—
इतनी खाली
कि उनमें सालों की चुप्पी भरी थी।
उसकी आवाज़ टूटी हुई थी—
“मुझे… जलाया नहीं गया था, गंगा…
मुझे… सज़ा दी गई थी।”
गंगाराम के शरीर में झटके दौड़ गए।
उसे महसूस हुआ—
वह अकेला नहीं है।
यह सुरंग
सिर्फ़ एक आत्मा की नहीं थी।
यह कई अधूरे न्यायों का रास्ता थी।
परछाईं बोली—
“गाँव पाप को छुपाता है, गंगा…
पर पाप
खुद को छुपाने नहीं देता।
जो मुझे मार गए…
अब उनकी रातें शुरू होंगी।”
हवा पत्थरों से टकराई।
एक ठंडी लहर उठी।
गंगाराम समझ गया—
यह सुरंग अब
सिर्फ़ सच का रास्ता नहीं रही।
यह बदले का आगार बन चुकी थी।
उसने लालटेन कसकर पकड़ी।
“कौन थे वे?
किसने तुम्हें जलाया?”
परछाईं ने हाथ उठाया—
और सुरंग के बाहर,
गाँव की दिशा में इशारा किया।
“गाँव का वो नाम…”
वह फुसफुसाई,
“जो आज भी
किसी की ज़ुबान पर नहीं आता।”
लालटेन की लौ ज़ोर से काँपी।
हवा और भारी हो गई।
अँधेरा और सघन।
और उसी अँधेरे से
एक और आवाज़ कराह कर बोली—
“अब… हमारी बारी है…”

आर एस लॉस्टम

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