
भोर हुआ है उठ जाग मुसाफ़िर,सूरज की लालिमा करें इंतज़ार।
रात ढली, तारे भी सोए, नई सुबह का हुआ खूबसूरत संचार।।
अंधेरा छटा, प्रकाश फैला तथा पंख फैलाए पंछी करें पुकार।
हे आलसी मनुज! छोड़ो आलस, त्यागो निद्रा आ जाओ बाहर।।
चारो ओर है आनंदमय वातावरण जो भोर में रहते हैं सदाबहार।
शीघ्र अतिशीघ्र जागने का करें प्रयास तभी हो सकेगा उद्धार।।
समय कभी नहीं रुकता है आखिर चलता ही जाता है।
समय की कद्र करने वाला हर पल नया अवसर पाता है।।
शीतल पवन का ठंडा झोंका मन में नवीन उमंग जगाता है।
नई आशा और नया सपना तुझको निमंत्रण देता जाता है।।
हे कर्मठ! सफलता का उच्च शिखर पाना है तो जागो।
कठिन परिश्रम की उचित परिभाषा के साथ भागो।।
अधिक निद्रा और किसी की भी निंदा को अभी त्यागो।
इसलिए ईश्वरीय आनंद प्राप्त करने वालों जल्दी जागो।।
जीवन के रंग तुझको बुला रहे हैं और किस्मत चमका रहे हैं।
रास्तों पर पग धरता चल क्योंकि नए फूल खिलते जा रहे हैं।।
नदियाँ, झरनें और सागर की लहरों के रूप धरते जा रहे हैं।
कलरव करते परिंदों के मधुर सुर तुझे ही बुलाते जा रहे हैं।।
भोर हुआ है उठ जाग मुसाफ़िर,सूरज की लालिमा करें इंतज़ार।
खो मत देना अनमोल क्षण पुरानी सीख से नव अवसर संवार।।
कवयित्री-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)












