
ऐ गांव तू क्या सोचे याद आता नहीं कभी,बचपन का घरौंदा,
वो मां का आंचल मखमली,
वो भाई बहनों की हंसी ठिठोली,
वो यारों की टोली , वो बिन फ़िक्र जिंदगानी,
क्या भूल गया मैं शहर की भागदौड़ में।
बसा है जो ह्रदय की तलहटी में,
जहां से हुआ अंकुरित मैं,
कैसे भूलूं वो सकूं कि रातें , वो दिनभर की शैतानी,
निकला गांव से कुछ करने की खातिर,
बन गया मशीन शहर की भागदौड़ में।
थक कर लौटता हूं जब भागकर ही तो लोकल पकड़ता हूं,
चलने लगा हूं मैं भी घड़ी की सुइयों की भांति,
झांककर देखता हूं जब कभी खिड़कियों के बाहर,
ऐ गांव तू मुस्कुराता हुआ नजर आता हैं,
सोचता हूं दौड़कर चला आऊं तुम्हारे पास,
लेकिन फिर खो जाता हूं शहर की भागदौड़ में।
विद्या बाहेती महेश्वरी राजस्थान।












