
पुरानी, सुनसान हवेली का दरवाज़ा जिस गड़गड़ाहट के साथ खुला, उसने पूरे गाँव की रीढ़ में जैसे डर की बर्फ़ जमा दी।
यह वही हवेली थी, जिसके सामने से बच्चे कभी तेज़ क़दमों से निकल जाया करते थे।
वही हवेली, जिसके बरामदे में कभी पाँच दीये जला करते थे—
और आज पाँच दशकों से वहाँ सिर्फ़ अँधेरा टँगा हुआ था।
गंगाराम ने बिना कुछ कहे राशिराम की बाँह दबाई और दोनों उस ओर बढ़ चले।
गाँव के लोग दूर ही रुक गए—कोई भी उस दहलीज़ को लाँघने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
- हवेली के भीतर — धूल, जाले और अतीत
दरवाज़े पर धूल की मोटी परत जमी थी, लेकिन साफ़ था कि उसे भीतर से धकेला गया था।
हवा भारी थी—गंध ऐसी, जैसे बरसों से यहाँ साँस तक न ली गई हो।
गंगाराम ने लालटेन उठाई।
रोशनी दीवारों पर पड़ी तो लगा मानो समय खुद अपनी शिकायतें लिख गया हो—
काले धब्बे, नाख़ूनों के खरोंच, और ऊपर तक जाते जले हुए निशान…
जैसे कोई आदमी दीवार तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश करता रहा हो।
राशिराम ने धीमे से पूछा—
“ये वही हवेली है… जहाँ चुन्नी काकी का परिवार रहने आया था?”
गंगाराम ने सिर झुका लिया।
“हाँ… इसी घर से उस रात की पहली चिंगारी भड़की थी।” - वह कमरा — जहाँ कभी एक परिवार सोया था
अंदर एक कमरे का दरवाज़ा बंद था—बाहर से नहीं, भीतर से।
गंगाराम ने बहुत धीरे से उसे खोला,
जैसे किसी सोई हुई स्मृति को जगा रहा हो।
कमरा ठंडा था—इतना कि लालटेन की लौ सिमट गई।
दीवार के सहारे एक पुरानी अलमारी खड़ी थी।
उस पर धूल से ढँकी एक तस्वीर—
चुन्नी काकी, उनका पति, और बीच में एक छोटी-सी बच्ची।
गंगाराम का सीना भारी हो गया।
उसने तस्वीर उठाई—फ्रेम के पीछे काँपते हाथों से लिखा था:
“जिस रात इस घर की आग बुझी,
उसी रात हमारा नाम भी बुझा दिया गया।”
राशिराम के हाथ काँप उठे।
“गंगा… ये किसने लिखा?”
गंगाराम की आँखें गहरी हो गईं।
“जिसे बचना था… पर बचने नहीं दिया गया।” - नीले कमरे का रहस्य
हवेली के सबसे पीछे एक छोटा-सा कमरा था।
दरवाज़े पर फीका पड़ा नीला रंग—उड़ा हुआ, जर्जर, पर अब भी नीला।
गाँव में कहा जाता था—
“नीला कमरा खुलेगा, तो रात जाग जाएगी।”
राशिराम सहम गया।
“गंगा… इसे मत खोल।”
गंगाराम ने धीमे, सख़्त स्वर में कहा—
“रात तो पहले ही जाग चुकी है, राशिराम। अब सच को भी जागना होगा।”
उसने दरवाज़े को धक्का दिया—
पहले हल्का, फिर ज़ोर से।
दरवाज़ा कराहता हुआ खुल गया।
अंदर दीवारें नीली थीं, पर जगह-जगह काले धुएँ के निशान।
फ़र्श पर जली हुई लकड़ी की एक डंडी पड़ी थी—
जैसे किसी ने आख़िरी बार बाहर निकलने की कोशिश की हो।
और फिर गंगाराम की नज़र दीवार के बीच उभरे एक नाम पर ठहर गई।
वह नाम धुएँ और खरोंचों से उकेरा गया था—
मानो किसी ने अपनी आख़िरी साँसों से पूरी ताक़त लगाकर लिखा हो।
लालटेन काँप उठी।
कमरा और ठंडा हो गया।
राशिराम ने फुसफुसाकर पूछा—
“कौन-सा नाम है, गंगा?”
गंगाराम ने काँपती आवाज़ में पढ़ा—
“धरवीर सिंह…”
राशिराम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
भीड़ में खड़े लोग सिहर उठे—
“धरवीर सिंह?
चुलिया का बाप…
गाँव का सबसे ताक़तवर आदमी…”
किसी ने काँपती आवाज़ में कहा—
“तो… चुन्नी काकी को उसी ने…?”
गंगाराम ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में नंगी सच्चाई थी—
“हाँ। उसी ने आग लगवाई थी।
और उसी ने उस बच्ची को भी… आग में छोड़ दिया था।”
सनाटा छा गया।
हवेली जैसे कराह उठी—
“हमने देखा था… हमने सुना था…”
तभी ठंडी हवा का एक झोंका आया।
दीवार पर लिखा नाम फिर चमक उठा—
“धरवीर सिंह…”
राशिराम ने काँपकर कहा—
“लेकिन… वो तो पच्चीस साल पहले मर चुका है…”
गंगाराम पीछे हटते हुए बोला—
“हाँ… वो मर गया।
पर उसके पाप नहीं।
और जिन्हें उसने जलाया—
अब वे उसका नाम लेने लगे हैं…”
अचानक लालटेन बुझ गई।
अँधेरे में एक बहुत धीमी, बहुत ठंडी आवाज़ गूँजी—
“एक नाम और है, गंगा आर एस लॉस्टम












