धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र और निज जन्मभूमि की गाथा सुनाती हूँ।
सरस्वती नदी के किनारे बसी कर्मभूमि की सत्यता बतलाती हूँ।।
कौरव-पांडव का युद्ध यहाँ व जाग उठा धर्म का प्रकाश।
त्याग, भक्ति और ज्ञान से, जीवन स्पर्श कर गया आकाश।।
ज्योतिसर में श्रीकृष्ण ने दिया उपदेश जब हुआ पार्थ हताश।
स्थानेश्वर महादेव भी स्थापित हुए और नाच उठा सारा कैलाश।।
वैदिक सभ्यता और संस्कृति का जन्मस्थान माना है।
मेरी जन्मस्थली कुरुक्षेत्र का अद्भुत नज़ारा सबने जाना है।।
हिंदू, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि संतों के दर्शन रोज़ाना हैं।
सुकर्म और सुविचारों की सूची से संसार को चमकाना है।।
अर्जुन के सारे संशय मिटाकर जब योगी कृष्ण समझाता है।
योगमय का गीता-ज्ञान तब पार्थ को उचित पथ दिखलाता है।।
शेष बचे हुए विशेष पल को पूर्णतया: सफल बनाता है।।
अंधकारमय वातावरण को मिटाकर प्रकाश में ले आता है।
कुरुक्षेत्र की पावन भूमि को शत्-शत् नमन् करती हूँ।
महत्वपूर्ण तीर्थस्थल को कोटि-कोटि वंदन करती हूँ।।
सांस्कृतिक विरासत में प्राप्त देवालयों का चंदन करती हूँ।
अपने प्राचीन संग्रहालयों को हार्दिक अभिनंदन करती हूँ।।
अंत में धर्मक्षेत्र की पुनीत पुकार आज भी गूँज रही।
सत्य-धर्म अपनाने की ज़िद्द ज़िंदगी में गूँज रही।।
सात पवित्र वन और नौ पवित्र नदियाँ भी गूँज रही।
राजा कुरु की विशेष भूमि संपूर्ण विश्व में गूँज रही।।
हे कृष्णा! अधर्म पर धर्म की जीत आखिर हासिल करवाई।
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में आपने निज उपस्थिति दर्ज करवाई।।
कवयित्री-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)












