
उस रात अँधेरा कुछ ज़्यादा ही भारी था।
हवा में ठंड नहीं थी, बल्कि एक ऐसी खामोशी घुली हुई थी, जो दूर कहीं से आती ढोल की मद्धिम थाप की तरह दिल पर चोट करती जा रही थी।
बिहार का यह अँधेरा केवल रात का नहीं था—
यह दशकों से जमा हुआ साया था,
जो अब आकार लेने लगा था।
अंजना खिड़की के पास बैठी थी।
डायरी खुली थी, पर कलम ठहरी हुई।
वह गाँव जवाब देने आई थी,
पर यहाँ तो सवाल ही सवाल थे—
और अब वे सवाल उसके भीतर से उठने लगे थे।
- गाँव में फैलती अफ़वाह
सुबह होते ही एक नई बात फैल चुकी थी—
बिहारमियों की टोली फिर से सक्रिय हो गई है।
कहीं ज़मीन का झगड़ा,
कहीं रात में किसी के दरवाज़े पर खून से सने पत्थर।
अफ़वाहें हर बार सच नहीं होतीं,
पर बिहार में अफ़वाहें अक्सर भविष्य बन जाती हैं।
अंजना को लगा—
इतिहास फिर खुद को दोहराने चला है। - थाने की एक पुरानी फ़ाइल
शाम को वह सुजीत के साथ थाने पहुँची।
सुजीत ने काउंटर पर एक फटी-पुरानी फ़ाइल रख दी।
“यही है वो फ़ाइल…
जिससे तुम्हारे बाबा का नाम पहली बार आया था।”
अंजना ने पन्ने पलटे।
पीले पड़ चुके काग़ज़ों पर लिखा था—
“बिहार तालिमी चौक हत्याकांड – 1978”
उसका दिल बैठ गया।
उसके बाबा
गवाह नहीं
संदिग्ध।
“ये… ये कैसे…?
उसकी आवाज़ काँप गई।
सुजीत ने धीरे से कहा—
“हर आदमी दो कहानियाँ जीता है, अंजना
एक दुनिया के लिए,
और एक, जिसे वह खुद से भी छुपा लेता है। - सच और झूठ की महीन रेखा
लौटते समय सड़क सुनसान थी।
पेड़ों की परछाइयाँ लंबी होकर रास्ता रोक रही थीं।
अंजना ने खुद से पूछा
क्या मेरे बाबा सच में निर्दोष थे?
या हम सब झूठ की विरासत ढोते आए हैं?
उस रात वह देर तक रोती रही,
क्योंकि पहली बार उसने समझा—
सच… सबसे गहरा अँधेरा होता है। - लौटता हुआ अतीत
रात गहरी हो चुकी थी,
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
अंजना सिहर गई।
सुजीत घर पर नहीं था।
“कौन?” उसने पूछा।
उधर से भारी, थकी हुई आवाज़ आई
“बिटिया
मैं हूँ…
तुम्हारे बाबा का पुराना साथी—
देवकीनंदन।
दरवाज़ा खुला।
सामने एक बूढ़ा आदमी था
आँखों में डर और पछतावा एक साथ।
वह बैठा और बोला
“जो फ़ाइल तुम्हें मिली है
वो आधी कहानी है।
बाकी आधी
मैं बताने आया हूँ।”
अंजना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
“सच बताइए,” उसने कहा,
“मेरे बाबा कौन थे?”
देवकीनंदन ने उसकी आँखों में देखा
“सच सुनने की हिम्मत है?”
कमरा ठंडा पड़ गया।
डायरी के पन्ने हवा से काँप उठे।
अंजना ने कहा
“हाँ
आज मैं सब सुनने आई हूँ।”
देवकीनंदन ने आँखें बंद कीं
और अतीत ने
जैसे अपना मुँह खोल दिया
आर एस लॉस्टम












