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बाबा का सच — जो दबा था, दफ़न नहीं हुआ था


देवकीनंदन ने काँपते हाथों से अपना गमछा उठाया
और चेहरा पोंछ लिया।
उसकी साँसें भारी थीं—
जैसे वह कोई सच नहीं,
अपने भीतर बरसों से दबी
किसी अधूरी गुनाहगाथा को
बाहर निकालने जा रहा हो।
अंजना उसे देख रही थी—
हर हरकत, हर झिझक।
सब कुछ उसके भीतर
ठंडे डर की तरह उतर रहा था।
उसने कितनी बार ख़ुद से कहा था—
“बाबा अच्छे थे…
साफ़ दिल के थे…
दूसरों के लिए खड़े रहने वाले इंसान थे।”
लेकिन इस बूढ़े आदमी की आँखों में
जो कंपन था,
वह बता रहा था—
आज जो सामने आने वाला है,
वह सिर्फ़ कहानी नहीं होगी…
वह सच होगी।

  1. “तुम्हारे बाबा वैसे नहीं थे, जैसा तुमने सुना है…”
    देवकीनंदन ने धीरे से कहा—
    “बिटिया…
    बिहार का इतिहास
    जैसा तुमने किताबों में पढ़ा
    या घर में सुना—
    वह पूरा सच नहीं है।
    आधा भी नहीं।”
    अंजना की पलकों में हलचल हुई।
    “तुम्हारे बाबा
    न तो देवता थे,
    न ही दरिंदगी से दूर।
    उस दौर में लोग
    इंसाफ़ नहीं देते थे—
    इंसाफ़ करते थे,
    अपने तरीक़े से।”
    अंजना का दिल
    जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो।
    वह कुछ बोल न सकी,
    लेकिन उसकी आँखों में
    सवाल तैरने लगे—
    कैसे? किस तरह?
    आख़िर उन्होंने किया क्या था?
  2. 1978 का वह दिन — जब पहली बार मिट्टी लाल हुई
    देवकीनंदन ने कहना शुरू किया—
    “वो 1978 की शाम थी।
    बिहार तालमी चौक पर
    दो पक्ष आमने-सामने आ गए थे।
    पहले पत्थर चले…
    फिर लाठियाँ…
    और फिर गोलियाँ।”
    उसकी आवाज़ भर आई।
    “लेकिन सच यह नहीं था
    कि दंगा अचानक हुआ।
    सच यह था
    कि उस दंगे को करवाया गया था…”
    अंजना की साँस अटक गई।
    “तुम्हारे बाबा ने
    उस दिन भिड़ंत रोकने की कोशिश नहीं की।
    बल्कि…
    उन्होंने एक पक्ष को ताक़त देकर
    आगे भेज दिया।”
  3. “वो नेता नहीं बनना चाहते थे… पर बनते चले गए”
    देवकीनंदन ने भारी स्वर में कहा—
    “तुम्हारे बाबा पढ़े-लिखे नहीं थे, बिटिया…
    पर दिमाग़ तेज़ था।
    उस समय बिहार में
    जिसके पीछे लोग होते थे,
    वही नेता माना जाता था।”
    उसने आँखें झुका लीं।
    “तुम्हारे बाबा चाहते थे
    कि उनका पक्ष
    किसी भी क़ीमत पर मज़बूत रहे।
    और यही चाहत…
    उन्हें धीरे-धीरे
    ख़ून की राजनीति की ओर
    ले गई।”
    अंजना की आँखों में आँसू भर आए।
    उसने धीमे से पूछा—
    “तो… क्या मेरे बाबा ने…
    किसी को…?”
    देवकीनंदन ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी।
    वह सिर झुका गया—
    जैसे अपने ही सवाल से
    शर्मिंदा हो।
  4. “हाँ बिटिया… पहली मौत उनके इशारे पर ही हुई थी”
    उसके शब्द
    हवा को चीरते हुए
    कमरे में फैल गए।
    “मैं उस रात उनके साथ था,”
    देवकीनंदन काँपते हुए बोला।
    “उन्होंने किसी को
    अपने हाथ से नहीं मारा…
    पर उनके कहने पर
    गोली चली थी।”
    कमरे में सन्नाटा उतर आया।
    “पहली लाश…
    उसी रात गिरी थी।”
    अंजना जैसे पत्थर हो गई।
    उसके भीतर बचा हुआ
    बचपन का आख़िरी भरोसा
    ढह गया।
  5. “लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है…”
    कुछ देर बाद
    देवकीनंदन ने फिर कहा—
    “बाबा सिर्फ़ पाप में नहीं डूबे थे, बिटिया।
    कुछ ऐसा भी है…
    जिसके बिना
    उनकी कहानी अधूरी है।”
    अंजना की धड़कन तेज़ हो गई।
    “कुछ ऐसा, जो बताता है—
    कि उन्होंने पाप क्यों किया,
    क्यों उस रात गोली चलवाई,
    और क्यों उसके बाद…
    वे रात-रात भर
    रोते रहे।”
    पाप का असल कारण — वह सच जो किसी को पता नहीं था
    अंजना ने टूटती हुई आवाज़ में पूछा—
    “क्यों…?
    उन्होंने ऐसा क्यों किया…?”
    देवकीनंदन ने गहरी साँस ली।
    “अब जो मैं बताने जा रहा हूँ, बिटिया,”
    उसकी आवाज़ भारी हो गई,
    “वह उनके पाप से भी बड़ा सच है…”
    उसने गमछा कसकर पकड़ लिया,
    जैसे अगला शब्द
    उसके हाथों से फिसल न जाए।
    अंजना का चेहरा पीला पड़ चुका था—
    डर, दुःख और टूटे विश्वास की छाया
    साफ़ दिखाई दे रही थी।
  6. “तुम्हारे बाबा ने ख़ून की राह खुद नहीं चुनी थी…”
    “बिटिया,”
    देवकीनंदन बोला,
    “तुम्हारे बाबा ने
    ख़ून करने का रास्ता
    अपने लिए नहीं चुना था।
    वह रास्ता उन्हें…
    किसी और को बचाने के लिए
    अपनाना पड़ा।”
    अंजना बेचैन हो उठी।
    “किसे बचाने के लिए?”
    देवकीनंदन ने सीधी उसकी आँखों में देखा—
    “तुम्हारी माँ को।”
    कमरा जैसे अचानक ठंडा पड़ गया।
  7. 1978 की वह रात — जब पाप मजबूरी बन गया
    “तुम्हारी माँ,”
    देवकीनंदन बोला,
    “उस समय गाँव की
    सबसे सुंदर,
    सबसे तेज़ लड़की मानी जाती थी।
    और वही सुंदरता…
    उसके लिए अभिशाप बन गई।”
    उसकी आँखें भर आईं।
    “कुछ ताक़तवर लोग थे—
    जिनका नाम लेना
    आज भी डराता है।
    उन्होंने तय कर लिया था
    कि तुम्हारी माँ को
    पाना है।”
    अंजना की मुट्ठियाँ
    अपने आप भींच गईं।
    “जब यह बात
    तुम्हारे बाबा को पता चली,
    तो उन्होंने
    पंचायत, ठाकुर, पटेल—
    किसी की नहीं सुनी।
    उन्होंने साफ़ कहा था—
    ‘जो मेरी औरत पर
    नज़र डालेगा,
    उसका नाम
    मिट्टी में मिला दूँगा।’”
  8. “जिस लड़के की मौत हुई थी…”
    देवकीनंदन की आवाज़ धीमी पड़ गई—
    “वह लड़का कोई मासूम नहीं था, बिटिया।
    वह उन चार लोगों में से एक था
    जो उस रात
    हवेली के पीछे से
    तुम्हारी माँ को
    उठाने आए थे।”
    अंजना की साँस भारी हो गई।
    “तुम्हारे बाबा ने
    किसी को सीधे नहीं मारा।
    लेकिन उन्होंने
    अपने आदमी भेजे—
    कि उन्हें रोका जाए,
    किसी भी तरह।”
    “उस रात गोलियाँ चलीं…
    और पहली मौत हुई।”
  9. “उस मौत के बाद गाँव बदल गया… और तुम आईं”
    “उसके बाद,”
    देवकीनंदन ने कहा,
    “तुम्हारे बाबा की इज़्ज़त बढ़ गई।
    लोग कहने लगे—
    ‘यह आदमी डटकर रहता है।’”
    उसके स्वर में कड़वाहट थी।
    “लेकिन उनके भीतर…
    एक जंग शुरू हो चुकी थी।”
    “तुम्हारी माँ
    कई दिनों तक
    डर के मारे
    घर से बाहर नहीं निकली।
    और कुछ महीनों बाद…
    तुम पैदा हुईं।”
  10. “तुम्हें देखते ही तुम्हारे बाबा टूट गए थे”
    “लोग उन्हें
    बहुत मज़बूत आदमी समझते थे,”
    देवकीनंदन बोला,
    “पर सच यह है, बिटिया—
    तुम्हें पहली बार देखते ही
    वे रो पड़े थे।”
    उसकी आवाज़ काँप गई—
    “वे कहते थे—
    ‘अगर मैंने पाप न किया होता,
    तो मेरी बेटी का जन्म
    ख़ून की दहशत में
    नहीं होता।’”
    अंजना की आँखों से
    आँसू बहने लगे।
  11. “उन्होंने दूसरा पाप इसलिए नहीं किया— क्योंकि तुम थीं”
    “उनके हाथों से
    और भी ख़ून बह सकता था,”
    देवकीनंदन बोला।
    “राजनीति, जाति, बदला—
    सब उन्हें खींच रहे थे।
    लेकिन उन्होंने
    खुद को रोक लिया।”
    “वे कहते थे—
    ‘पहली बार
    उसे बचाने के लिए पाप किया।
    दूसरी बार करूँगा
    तो अपनी बेटी की नज़रों से
    गिर जाऊँगा।’”
  12. “वे गुनहगार थे… पर तुम्हारे लिए बने रहे”
    देवकीनंदन खड़ा हो गया।
    “मैं उनके पाप को
    सही नहीं ठहराता, बिटिया।
    पर इतना जान लो—
    जो ख़ून की शुरुआत उन्होंने की,
    वह हवस रोकने के लिए थी,
    हिंसा फैलाने के लिए नहीं।”
    अंजना की आँखों में
    अब आँसू नहीं थे—
    बस एक गहरी, भारी उदासी थी।
    उसने पूछा—
    “क्या गाँव यह सब जानता था?”
    देवकीनंदन ने सिर हिला दिया—
    “नहीं, बिटिया।
    गाँव सिर्फ़ ख़ून देखता है—
    उसका कारण नहीं।”
    उसी क्षण बाहर अँधेरे से
    एक खुरदरी, टेढ़ी आवाज़ गूँजी—
    जैसे कोई पुराना दरवाज़ा
    धीरे-धीरे खुल रहा हो।
    दोनों सिहर उठे।
    देवकीनंदन फुसफुसाया—
    “बिटिया…
    लगता है परछाइयाँ
    अब तुम्हारे बाबा की कहानी भी
    सुन चुकी हैं…”
    आर एस लॉस्टम

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