Uncategorized
Trending

मझधार

सब फंसे मझधार में
तलाशते फिर रहे है किनारा,
पढ़ लिख कर घूम रहे
कैसे चलेगा दुनिया में गुजारा।
बांह चढ़ा कर घूम रहे
जीवन नैया डगमगा रही,
सच झूठ का प्रश्न नहीं
अब तो होती सिर्फ बतकही।
दर्द देखना है तो देखो जो
दो जून की रोटी को मरता है,
पेट भरा है जिनका यारों
वो सिर्फ भेद की बातें करता है।
सच पूछो थक हार गया है
मानव जीवन के अंतर भेदों से।
रक्त रंजित हो गया हृदय
कटु शब्द बाण के छेदों से।

कवि संगम त्रिपाठी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *