
मैं जानता हूँ उसे किसी और का होते नहीं देख सकता
ये ईर्ष्या नहीं है, बस दिल इतना छोटा नहीं देख सकता।
कुछ प्रेम बहुत गहरे उतर जाते हैं रूह के शहरों में
हर रोज़ का आदमी उन्हें यूँ बदलता नहीं देख सकता।
अगर वो कहीं और हँसती है, चैन से साँसें लेती है
तो मेरा इश्क़ उसे रोक ले—मैं ऐसा नहीं देख सकता।
मुझे हक़ नहीं कि उसकी खुशियों को ज़ंजीर कर दूँ
प्रेम अगर क़ैद बने, तो मैं उसे प्रेम नहीं देख सकता।
मैं अब भी इतना कमज़ोर हूँ कि टूट जाऊँ शायद
उसे किसी और की बाँहों में हँसता नहीं देख सकता।
पर इतना समझ लिया है कि उसका सुकून बड़ा है
मेरा अहं उसके आगे खड़ा नहीं देख सकता।
वो मेरी न हुई तो भी ये इश्क़ अधूरा नहीं होगा
कुछ प्रेम लिखे जाते हैं, कुछ लिखता नहीं देख सकता।
मैं उसकी राह का काँटा नहीं बनना चाहता अब
मैं अपने प्रेम को नफ़रत बनता नहीं देख सकता।
वो मेरी ज़िंदगी की सबसे गहरी सी अनुभूति है
जो पूरा न हुआ, पर मुझे अधूरा नहीं देख सकता।
अगर छोड़ना ही इश्क़ की आख़िरी सच्चाई है
तो मैं उसे छोड़ते हुए नफ़रत नहीं देख सकता।
आर एस लॉस्टम












