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मौन बहती गंगा

पहाड़ों से गंगा की धारा जब निकली होगी,
दरारों के सीने को फाड़ते चली होगी।

बर्फ़ की गोद से उतरकर मैदाँ तक आई,
हर मोड़ पर उसने अपनी राह गढ़ी होगी।

धरती पर पाँव रखते ही पावन कहलायी,
पर मानव ने उसकी मर्यादा तोड़ी होगी।

कहीं पूजा में सजी, कहीं कचरे में डूबी,
सच कहूँ, गंगा ने बहुत अपमान सही होगी।

फिर भी उसने सबको जीवन देना न छोड़ा,
विष और अमृत दोनों को सहती रही होगी।

लॉस्टम, यही उसकी सबसे बड़ी करुणा है,
कि माँ होकर भी वह मौन बहती रही होगी।

आर एस लॉस्टम

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