
चरणों की रज दे-दे माँ, बेड़ा पार लगा दे माँ।
राह तके ‘श्वेत-वासिनी’, ज्ञान का दीप जला दे माँ॥
ज्ञान का दीप जला दे माँ…
तू जग-तारिणी, मंगल-करणी, कमल-आसिनी माँ,
मेरी लेखनी में धार दे, महिमा अपरंपार माँ।
अज्ञान का तिमिर हटाकर, ज्योति नई दिखा दे माँ॥
ज्ञान का दीप जला दे माँ…
दोनों कर जोड़ूँ मैं वंदन, करे जग अभिनंदन,
मैं मूरख अज्ञानी मैया, भर दे अतुलित ज्ञान माँ।
अपनी कृपा की वर्षा से, मेरा कंठ सजा दे माँ॥
ज्ञान का दीप जला दे माँ…
कोरे कागज़ पर माँ मैंने, तेरी तरुणाई पाई,
वीणा की झंकार से, सोई चेतना जगा दे माँ।
चरणों की रज दे-दे माँ, बेड़ा पार लगा दे माँ॥
ज्ञान का दीप जला दे माँ…
रजनी कुमारी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश












