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मेरे प्रभु राम

प्रेम सुधा बरसाने को, वसुधा पर आए श्री राम,
दशरथ नंदन, ज्येष्ठ पुत्र, ‘पुरुषोत्तम’ कहलाए राम।
हर पीड़ा को हर लेते, भवसागर से तारते हैं,
तम का तिमिर मिटाकर प्रभु, उजियारा फैलाते राम।।

​कण-कण में सजीवता उनकी, रोम-रोम की पावनता,
नवल भोर की प्रथम किरण सी, सुखद सौगात हैं राम।
नतमस्तक गंगा की लहरें, यमुना भी वंदन करती,
भक्ति देख कर प्रेम-वश, जूठे बेर भी खाते राम।।

​नयनों की नमी पोंछकर, मन का हर्ष बढ़ाते राम,
सृष्टि की हर कलाकृति में, प्राण फूँकते मेरे राम।
अंजनी-पुत्र के हृदय विराजे, भक्त-वत्सल कहलाते,
स्वर्णिम युग की अमित पहचान, अयोध्या-पति श्री राम।।

रजनी कुमारी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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