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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम – सफर जिंदगी का…
लेखक :- भोले नेमा “चंचल”. जो कि एक विद्वान साहित्यकार मंचीय कवि, लेखक, मध्यप्रदेश शासन के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं.अनेकों अखिल भारतीय मंचों सहित दूरदर्शन व आकाशवाणी में काव्यपाठ किया हैं और निरंतर उपस्थिति हैं.निवास हर्रई जागीर, जिला छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)
समीक्षा :- कवि श्री भोले नेमा ‘चंचल’ का यह प्रथम काव्य संग्रह हैं.प्रकाशित काव्य संग्रह में ‘मन की बात’ शुरुआत में ही उन्होंने इन शानदार पंक्तियों से की हैं- ‘ सफ़र ज़िन्दगी का समाया ग़ज़ल में, ख़ुशी और ग़म का साया ग़ज़ल में…’ वाकई अपने काव्य जीवन में जो महसूस किया उस हर सच को उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से कागज़ पर उतारा हैं.इसी सच को उन्होंने पहली ग़ज़ल में ही कुछ इस तरह शेर में बयां किया हैं – रदीफों में सच हैं, हैं सच काफियों में, नहीं झूठ रब ने लिखाया ग़ज़ल में || वाकई एक उम्दा और वास्तविक कवि साहित्यकार वहीं हैं जो सच लिखने और बोलने का साहस करता हैं. 93 ग़ज़लों के इस संग्रह में आदमी की व्यवहारिक और वास्तविकता पर भी चोट हैं- कहाँ होली, दीवाली, तीज का त्यौहार पहले सा?, कहाँ रिश्तों में बाकी रह गया व्यवहार पहले सा? कवि निरंतर हो रहें औपचारिक रिश्तों पर गहरी चोट करता नज़र आता हैं. इसी ग़ज़ल का एक मिसरा हैं- ना छपता जुल्म सेठों का ना आवाजें गरीबों की, नहीं छपता शहर में अख़बार पहले सा! वर्तमान में अधिकांश व्यवसायिक होती पत्रकारिता और सिर्फ दिखने और बिकने के लिये छपते समाचार पत्रों पर कड़ा प्रहार हैं.हिंदी की ग़ज़लों में श्री दुष्यन्त कुमार का कोई सानी नहीं हैं… आम आदमी की जुबां उनकी हिंदी ग़ज़लों में शामिल हैं. वैसी ही ‘चंचल’ के हर मिसरे में सत्य और सरलता हर ग़ज़ल में समाहित हैं.आम आदमी की समझ भोले नेमा की ग़ज़लों में दिखाई देती हैं- ग़रीबी और सम्बन्धों पर चोट करता मिसरा कहता हैं,देखिये कि – “आपके पाँव धो के पी लेगा, उसके बच्चें बहुत ही भूखे हैं| उनसे पूछो कि क्या गया उनका, जिनके घर दोस्तों ने लूटे हैं!! मेहनतकसों के हक़ में लिखा हैं- खूब पिये हैं उसने आँसू, यूँ ही वो ना खारा होगा, जब मेहनत के दीप जलेंगे, जगमग आंगन सारा होगा”! गैरों पर ऊँगली उठाकर ख़ुद का दामन साफ बताने का दौर आज खूब चलन में हैं.हर आदमी सिर्फ ख़ुद की खूबी को उजागर करना चाहता हैं इस सच को’ ‘चंचल’ नें यूँ उतारा हैं- दिल से हो तुम कितने साफ इसकी भी बात हो, महफिल में चमकदार परिधान मत बता| मौका मिलें तो झांकना अपने भी दिल में तुम, यूं हर किसी को ‘चंचल’ बेईमान मत बता|| पूजनीय माता जी श्रीमती राधारानी नेमा को समर्पित इस काव्य संग्रह की ग़ज़लों में “माँ” पर कई मिसरें शामिल हैं जों माँ की सर्वोच्च महत्ता को दर्शाते हैं जैसे के- ” कितनी कड़वी हैं जीवन की सच्चाईयां, साथ में ना रहें अपनी परछाईयां, रात दिन गुजारें मेरी जिक्र में, माँ के चेहरे पे हैं तभी तो यें झाईयां! देखें कि- “कभी मेरी ग़ज़ले अकेले में पढ़ना, हैं ख़ुद को हँसाया रुलाया ग़ज़ल में.. हैं माँ की दुआएं पिता का हैं सम्बल,नहीं और कुछ भी मिलाया ग़ज़ल में!!..” माँ के आंचल सी पावन हैं, मेरी सारी प्यारी ग़ज़लें..मंदिर में अरदासों सी हैं, माँ और बाबा वाली ग़ज़लें”¡¡..भाई ‘चंचल’ का हर मज़मून ख़ुद का महसूस किया हुआ लगता हैं..आस्था का चोला ओढ़े व्यवस्था को धूमिल करते व्यक्तियों पर सच बयां करते मिसरे हैं- ” सभी के पाप धोकर, हुई गंगा बहुत मैली, कहो कितने हुए पावन, भला गंगा नहाने से..अभी भी हैं समय, ‘चंचल’ संभल जाओ तो अच्छा हैं, करोगे बाद में शिकवा, समय के बीत जाने से..!! सच दबाने वालों पर प्रहार करती कुछ लाईनें क्या खूब कहती हैं-” यार कितना कमाल करते हो.. झूठ से सच हलाल करते हो!!काट के परिंदों के पर मियाँ, उनका उड़ना मुहाल करते हो||
‘चंचल’ की लेखन शैली बहुत ही सरल और समझने योग्य है. हर विषय में प्रेरणा हैं, संदेश हैं. काव्य संग्रह मोबाइल नंबर 9424317918 पर सम्पर्क कर मंगाया जा सकता है.
निष्कर्ष:- सभी ग़ज़ल के मजमून आम पाठक और जन सामान्य से जुड़े हुए हैं..उन्होंने जो देखा, महसूस किया उसी को स्याही में उतारा हैं. काव्य सह ग़ज़ल संग्रह हाथों में होते ही पहली से अंतिम ग़ज़ल तक पढ़ते जाने का मन करता हैं. क्योंकि वो अहम् बातें ‘सफ़र जिंदगी का’ में शामिल हैं.
समीक्षक
शैलेश “शैल”
हास्य -व्यंग्य कवि, लेखक
जिला मीडिया प्रभारी (P.R.O.)
स्वास्थ्य विभाग, बालाघाट

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