
सच की पहली सीढ़ी—
उन नामों तक,
जिन्हें सब जानते थे,
पर कोई बोलता नहीं था।
रात और गहरी हो चुकी थी।
हवेली की दीवारों पर जो परछाइयाँ
काँप रही थीं,
वे केवल अँधेरे की नहीं थीं—
वे बीते पापों की थीं,
दबे हुए डर की थीं,
और उन कहानियों की थीं
जिन्हें गाँव ने जानकर भी
अनदेखा कर दिया था।
अंजना ने लालटेन उठाई।
उसके गालों पर आँसुओं के निशान थे—
पर आँखों में डर नहीं था।
कुछ और था—
वह ज़िद,
जो टूटने के बाद पैदा होती है।
देवकीनंदन उसे देख रहा था,
जैसे वह पहले ही समझ गया हो—
यह लड़की
लौटने नहीं जा रही।
- वह रास्ता, जिस पर जाना मना था
“कहाँ जा रही है, बिटिया?”
देवकीनंदन की आवाज़ काँप उठी।
अंजना ने बिना रुके कहा,
“उन लोगों के पास…
जिनका नाम लेने से भी
यह गाँव डरता है।”
देवकीनंदन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“नहीं! इस वक़्त वहाँ जाना मतलब—
ख़ुद मौत को बुलाना।”
अंजना पहली बार उसकी ओर मुड़ी।
“अगर डर ही सब कुछ होता, दादा,
तो इस गाँव में
कभी खून नहीं बहता।”
उसने हवेली की चौखट लाँघ ली।
हवा एक पल को थम गई—
जैसे उसके फ़ैसले को पहचान गई हो। - दक्षिण टोला की ओर — जहाँ सच दबा रहता था
पगडंडी सँकरी थी।
चाँद बादलों में छिपा हुआ।
सन्नाटा
हर क़दम पर
पीछे-पीछे चलता महसूस हो रहा था।
देवकीनंदन साथ था—
डरा हुआ,
पर रुक नहीं पाया।
“तू जानती भी है
वहाँ कौन रहता है?”
उसने धीमे से पूछा।
अंजना रुकी।
“जो बाबा के असली दुश्मन हैं।”
देवकीनंदन ने सिर झुका लिया।
“तीन लोग थे, बिटिया…
जो तेरी माँ को
पहले से जानते थे।
एक मर गया,
दो आज भी ज़िंदा हैं।”
अंजना का दिल ज़ोर से धड़का—
पर उसके क़दम नहीं रुके। - दक्षिण टोला की ख़ामोश गलियाँ
गली में कुत्ते तक नहीं भौंके।
जैसे पूरी बस्ती
सोते हुए भी
जाग रही हो।
वे एक जर्जर घर के सामने रुके।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर गहरा अँधेरा।
देवकीनंदन ने फुसफुसाकर कहा,
“यह… नरउत्तम का घर है।”
अंजना ने नाम दोहराया—
“नरउत्तम…”
“हाँ,” देवकीनंदन बोला,
“वही जिसने तेरी माँ से
सबसे पहले बात की थी,
और जिसने बाक़ियों को
हवेली तक खींच लाया था।”
अंजना के भीतर
एक ठंड उतर गई। - “आ जा… मुझे पता था तू आएगी”
अचानक भीतर से आवाज़ आई—
खुरदरी, कटी हुई।
“इतने साल बाद भी
शक्ल पहचान ली…
बिलकुल तेरी माँ जैसी है।”
देवकीनंदन का गला सूख गया।
अंजना ने लालटेन ऊँची की।
अँधेरे से
एक दुबला, टेढ़ा आदमी बाहर आया।
उसकी आँखें डरावनी नहीं थीं—
बल्कि
कुछ ज़्यादा ही देखने वाली थीं।
वह हँसा।
“बाबा की कहानी सुनने आई है…
या अपनी माँ का सच?”
अंजना ने बिना हिचक कहा,
“दोनों।”
नरउत्तम एक क़दम और पास आया।
“तो पहले
तेरी माँ का सच सुन—
जिसे उसने
ख़ुद छिपा लिया था।”
लालटेन की लौ
हल्की-सी काँप गई। - “तुम्हारी माँ… हवेली की बहू बनना नहीं चाहती थी”
“तेरी माँ
किसी और से शादी करना चाहती थी।”
नरउत्तम ने ऐसे कहा
जैसे पत्थर फेंका हो।
अंजना के पाँव
अपने आप पीछे हट गए।
देवकीनंदन चीख पड़ा—
“झूठ बोल रहा है!
इतना बड़ा इल्ज़ाम?”
नरउत्तम की हँसी
कड़वी थी।
“उसे लगता था
वह अपने लिए पति चुनेगी।
पर पंचायत
और तेरे बाबा की ताक़त ने
उसे ज़बरन
हवेली में बैठा दिया।”
अंजना की उँगलियाँ
सुन्न पड़ गईं।
“और जिस रात
उसे लेने आए…”
नरउत्तम बोला,
“वह चुप थी।
डर से नहीं—
जानती थी,
अगर बोली
तो खून बहेगा।”
वह झुककर बोला—
“तुम्हारा जन्म
पसंद से नहीं, बिटिया…
मजबूरी से हुआ था।” - “और खून… बदले का था”
नरउत्तम की आँखों में
आग थी।
“खून इसलिए नहीं बहा
कि वे ग़लत थे।
खून इसलिए बहा
क्योंकि
उनकी इज़्ज़त के लिबास
उधड़ गए थे।”
अंजना को लगा
ज़मीन हिल रही है।
देवकीनंदन चिल्लाया—
“ये सच नहीं है!”
नरउत्तम मुस्कराया।
“तो आ…
जो दिखाऊँगा,
उसके बाद
तू ख़ुद तय कर लेना।”
अंजना के भीतर
डर, ग़ुस्सा और टूटन
एक साथ उठे।
उसने कहा,
“दिखाओ।
जो भी छिपा है—
सब।”
नरउत्तम पीछे हटा।
दरवाज़ा
पूरी तरह खुल गया।
अंदर
अँधेरा नहीं था—
कुछ और था।
ऐसा…
जिसकी गंध तक
डराती थी।
और अंजना
उस अँधेरे के सामने
क़दम रोक चुकी थी।
आर एस लॉस्टम












