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शीर्षक-प्रेम गली अति सांकरी
विधा -कविता

प्रेम गली अति सांकरी
मत ना जाईयो कोई ,
ढ़ाई आखर प्रेम पढ़ें
बिन बने ना पंडित कोई।
काहे करता मेरा मेरा
ये काया भी ना अपनी होय,
पड़ माया के चक्कर में
जन्म अपना काहे खोय ।
लगा लें मन प्रेम धुनी
भटकता क्यूं फिरें,
मीरा सा मन लगा
विष अमृत हो जाए।
प्रेम धुनी ऐसी जागी
वैष्णवी राम राम रटती जाएं,
कलयुग के अंत में
कंलगी को प्रेम रुप में पाए।
राधा ने भी कान्हा को जपा
नाम अमर हो जाए,
कृष्ण अकेला ना कहें
राधेकृष्ण फिर कहलाएं।
जपती जपती हारी ना सबरी
दिन रात गलियन  सजाएं,
उम्र बीती गई सारी उसकी
अंत समय राम जाएं समाएं।
प्रेम का बंधन है ऐसा देखो पर
जो ना पड़े पछताएं,
चल गया इस गलियन में
भव से पार लगाएं।।


प्रिया काम्बोज प्रिया
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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