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कुछ तुम लिखो, कुछ हम लिखें

कुछ तुम लिखो, कुछ हम लिखें।
जो नहीं दिखता, वह सच लिखें।।

हौसलों की स्याही से हकीकत बन जाएँगे।
हिम्मत से बुलंदियों के पार भी हम जाएँगे।।
हसरतें जो भीतर हैं पूरा करकेे दिखलाएँगे‌।
पावन धरा पर स्वर्गलोक अवश्य लेकर आएँगे।।

न किसी से डरे हैं और न ही निर्बल को धमकाएँगे।
सिंह के समान दहाड़ते हुए शत्रु को मार गिराएँगे।।
तकदीर बदलने हेतु तलवार भी खूब चलाएँगे।
तहज़ीब में रहकर ही तस्वीर विशेष बनाएँगे।।

दृढ़ विश्वास स्वयं के पास है पर अंधविश्वासों से बचेंगे।
असंख्य या अनगिनत अरमानों संग ही जीवन निज जीएँगे।।
कड़वे घूँट भी यदि पीने पड़ जाएँ तो अवश्य हम पीएँगे।
जीते जी अपने भारत देश पर आँच कभी नहीं आने देंगे।।

हे मनुज! कलम की ताकत से कुछ ऐसा लिखते जाओ।
अपने अंतर्मन की अद्भुत क्षमता को शीघ्र ही दिखलाओ।।
समय हाथों से छूट रहा है इसलिए बस अभी संभल जाओ।
कोशिशों के बलबूते पर कमाल करते हुए ही किरदार निभाओ।।

लेखनी आपकी तभी होगी सार्थक जब होंगे उच्च विचार।
केवल परोपकारी भावनाओं के साथ ही रखना सद्व्यवहार।।
ईश्वर से प्राप्त मानव-तन जैसे उपहार स्वरूप करना उपकार।
स्नेह और सहानुभूति की सहायता होनी चाहिए बारंबार।।

अंत में कुछ तुम लिखो, कुछ हम लिखें।
चारों दिशाओं में बस प्रेम-प्रेरणा ही दिखे।।

-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)

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