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मोह-माया

मोह-माया का ये बंधन
है उस अनन्त की माया
है ये कलि काल ब्रह्मज्ञान बात है दूर
मोहपाश बंधन बंधा है–
जीव
असत्य धन व झूठी काया
जग को —
उस अनश्वर की माया ने भरमाया
सृष्टि में सभी कुछ नश्वर ।

जंगल में चाहे उपजा जीवन
सभी कुछ एक अज्ञात बंधन
कब तक ये चक्कर
आवागमन को समझ न पाया
जीव रह गया थक कर।

धरा पर–
विस्तृत अज्ञात उस शक्ति का स्पन्दन
मानव बंधा उस डोर
रचयिता जाने उस का बंधन
जग ये भौतिक काल की माया
अध्यात्म ज्ञान हुआ — रसातल
सुख खोज रहा पल-पल
सुख पा ले गा
आज नहीं तो कल ।
जो भोग लिया वही है —
अपना
वो न जाने–
जिसे खोज रहा वो है सपना

फ़लसफ़ा सदियों से ढूंढ रहा
सृष्टि में ये कैसा
मोह स्पन्दन
थाह न पाई
ये आकर्षण ये कैसा है बंधन ।

                 -- महेश शर्मा, करनाल

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