
गणतंत्र दिवस भारत का, गौरव-पर्व महान,
संविधान में बसता है, राष्ट्र का अभिमान।
इतिहास मात्र नहीं यह, संकल्पों का गान,
जन-जन की चेतना में, लोकतंत्र की पहचान।
छब्बीस जनवरी आई, नव-विश्वास लिए,
न्याय, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व साथ दिए।
स्वाधीनता के बलिदानों का अमिट सम्मान,
संविधान में ढलकर, बने राष्ट्र का प्राण।
गणतंत्र का अर्थ यही—जनता की है शक्ति,
शासन का स्रोत वही, जहाँ हो सहभागिता।
मतदाता मात्र नहीं हम, राष्ट्र का निर्माण,
कर्तव्य-बोध से होता है, लोकतंत्र बलवान।
अधिकारों संग कर्तव्य का, संतुलन हो साथ,
तभी सुरक्षित रहती है, स्वतंत्रता की राह।
संविधान, ध्वज, प्रतीकों का, रखें हम सम्मान,
सार्वजनिक हित में जीना, यही सच्चा ज्ञान।
केसरिया साहस बोले, त्याग-वीरता का मान,
श्वेत शांति, सत्य-पथ का, करता सदा विधान।
हरित रंग आशा बनकर, श्रम-साधना प्रमाण,
जीवन-ऊर्जा से भर देता, भारत का हर प्राण।
नील गगन-सा अशोक चक्र, धर्म-न्याय का संकेत,
गति, अनुशासन, कर्म-पथ का, देता स्पष्ट संदेश।
रुकना नहीं, बढ़ते रहना—यही इसका ज्ञान,
निरंतर प्रगति में बसता, राष्ट्र का उत्थान।
युवा शक्ति है देश की, आशा और आधार,
ज्ञान, नैतिकता, नवाचार, बने उनका श्रृंगार।
राष्ट्रहित में ऊर्जा अर्पित, रचें नया निर्माण,
मूल्य-आधारित गणतंत्र का, करें सुदृढ़ विधान।
परेड, झाँकियाँ कहती हैं, संस्कृति की बात,
शौर्य, अनुशासन, एकता, चलते साथ-साथ।
सशस्त्र बलों का साहस, देता विश्वास महान,
भारत अडिग, अटल रहेगा—यही उद्घोष जान।
आज के युग में गणतंत्र, माँगे सजग ध्यान,
हर नागरिक की भूमिका, बने इसका प्राण।
संस्थाएँ हों या जनसाधारण, सबका एक विधान,
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा—सबका कर्तव्य जान।
यह उत्सव है हर मानव के, संकल्पों का द्वार,
अतीत से सीख लेकर, भविष्य का विस्तार।
न्याय, समानता, प्रेम-प्रीति का हो विस्तार,
इस पावन अवसर पर, शुभकामनाएँ अपार।
योगेश गहतोड़ी “यश”
नई दिल्ली – 110059












