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मुस्कुराते रहना

आँसूओं के सागर मे खुद के लिये मुस्कुराहट कहाँ से लाऊं
कष्टों के जंजाल मे खुद के लिये राहत के दो पल कहाँ से लाऊं

क्या सज़ा है कैसी ये सज़ा है पल पल की हिस्से मेरे ही आई है
कहते है हर रात के बाद सुबह है ये सुबह क्यों मुरझाई है

सुख दुख उतार चढ़ाव जीवन के बदलते स्वरूप के अटूट पैमाने है
जीवन के इस बदलते स्वरूप से क्यूँ आज तलक हम ही अनजाने है

नसीहतें बड़ी है हर हाल ही मुस्कुराते रहना
गम अपना भूल दूजे का बांटते रहना

गम खूब बांटे दर्द हमारा ही दूनियाँ की नज़र मे कहीं खो गया
प्रेम अपनत्व सहानुभूति के लिये ही कसम दो जख तरस गया

मरने के हाल मे ज़िन्दा है ये बेशर्मी का सबब हमारा बेमिसाल है
दौर परवाह का अब खत्म है जीना मरना अपना अपना हाल है

क्या हमने किया नही हम ये जानते है
किसी का बुरा नहीं चाहा ये हम मानते है

यथार्थ है कलयुग का अच्छाई का वजूद हर हाल बुरा ही होगा
गर डूबना भी है इस विकराल सागर मे मुस्कुराते रहना होगा

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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