
साहित्य एक शब्द जिसका उपयोग लिखित और कभी-कभी बोली जाने वाली सामग्री का वर्णन करने के लिए किया जाता है। दरअसल साहित्य मनुष्य की अनुभूतियों को जागृत करने का कार्य करता है। यह सामाजिक समस्याओं संबंधों मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों और व्यक्तिगत अनुभवों को समझने में मददगार साबित होता है।
साहित्य का उद्देश्य का उपयोग मनोरंजन और सौंदर्यपरक आनंद देने के लिए किया जाता है। साहित्य वह सशक्त माध्यम है जो समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। लोगों को प्रेरित करने का कार्य करता है और जहां एक ओर यह सत्य के सुखद परिणामों को रेखांकित करता है वही सत्य का दुखद अंत कर सीख व शिक्षा प्रदान करता है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं की रोटी कपड़ा और मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है, यह एक अत्यंत ही प्रचलित एवं सर्वमान्य धारणा है। पर प्रेम की अनिवार्यता भी सहज मनुष्य जीवन के लिए उतनी ही है। अत्याचारी, व्यभिचारी घोर असामाजिक कहा जाने वाला व्यक्ति तक बिना प्रेम के नहीं जी सकता। प्रेम स्वाभाविक वृत्ति है। इस संसार में शायद,मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसे चर- अचर दोनों से प्रेम हो जाता है। प्रेम -प्रसंग पर साहित्य भरा पड़ा है जो की स्वाभाविक है। साहित्य में प्रेम का विषय हमेशा से प्रासंगिक रहा है।
“प्रेम और सद्भाव के रंग
सारी दुनियां पर बिखेरीए
प्यार और मोहब्बत से सराबोर करिए
अपने जीवन को रंगोत्सव बनाइए
जीवन के गीतों को प्यार से गुनगुनाइए”
मीराबाई की रचनाओं में श्रृंगार रस के दोनों पक्ष संयोग और वियोग का बड़ा ही मार्मिक वर्णन हुआ है। हिंदी गीति काव्य की परंपरा में मीरा का अपना अप्रतिम स्थान है। प्रेम की पीड़ा का जैसा मर्मस्पर्शी वर्णन मीरा की रचनाओं में उपलब्ध होता है वैसा हिंदी साहित्य में अन्यत्र सुलभ नहीं है।
” हे री, मैं तो प्रेम दीवानी
दर्द न जाने कोए”
प्रेम की बात अगर शुरू हो जाए तो रूमानी सा माहौल स्वत: ही बन जाता है। जहां तक मैं समझती हूं कि
बिना रूमानी हुए प्रेम पर चर्चा हो या कविता की अभिव्यक्ति हो ही नहीं सकती है। प्रेम की अनुभूति मात्र से देह-प्राण फूलों की तरह खिल उठते हैं। एक अजीब -सा एहसास होने लगता है
मां स्पंदित होने लगता है। प्रेम को परिभाषित करना आसान नहीं है, जिस प्रकार ईश्वर संसार के रचयिता के बारे में कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है।
हिंदी की रीतिकालीन कविता में मूलत प्रेम के दो रूप का वर्णन हुआ हुआ है एक लौकिक प्रेम और दूसरा पारलौकिक प्रेम का इसमें भी रीतिकालीन कवियों का दिल लौकिक प्रेम में अधिक लगा रहा और भक्ति काल के कवियों का दिल लौकिक प्रेम में अधिक लग रहा है और भक्ति काल के कवियों ने पर लौकिक प्रेम पर अधिक तवज्जो दी है।
‘पद्मावत की कथा के मध्य लौकिक प्रेम का वर्णन करते हुए जायसी ने अलौकिक प्रेम व्यंजना की ओर से संकेत दिया है।’प्रेम वाटिका ‘में राधा कृष्ण को प्रेम उद्यान का मालिन -माली मानकर प्रेम के गूढ़ तत्व का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। इस कृति में रसखान के द्वारा प्रतिपादित प्रेम लौकिक प्रेम से बहुत ऊंचा है। रसखान के काव्य में आलंबन- निरूपण में रसखान पूर्णतः सफल हुए हैं। वे गोपियों का वर्णन उसी तन्मयता के साथ करते हैं, जिस तन्मयता के साथ कृष्ण का।
“प्रेम-अयनि श्री राधिका,प्रेम बरन
नंदनंद ।
प्रेम -वाटिका के दोऊ माली- मालिन द्वंद्व।।
महादेवी वर्मा की कविताओं में प्रेम एक मूल भाव के रूप में प्रकट हुआ है उनका प्रेम अशरीरी है। महादेवी वर्मा की कविता में व्यक्त प्रेम इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि वह एक स्त्री की लेखनी से किया गया स्त्री मनोभावों का चित्रण है।
“जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करुणा,कितने संदेश”
जयशंकर प्रसाद के काव्य में प्रेम निरूपण में त्याग और बलिदान का स्वरूप मौजूद है तो वहीं दूसरी तरफ गीता का निष्काम कर्मयोग विद्यमान है।
भारतीय संस्कृति और मानव मूल्यों के पुरोधा कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने काव्य में नारी के तप, त्याग उनकी सेवा प्रेम वियोग का हृदय स्पर्शी चित्रण ही नहीं किया है अपितु नारी की गरिमा एवं परोपकार भावना की सुंदर अभिव्यक्ति भी वहीं की है।
वही साहित्य में सद्भावना का प्रसंग भी खूब देखने को मिलता है।
सद्भावना का शाब्दिक अर्थ ‘सत्य की भावना’होती है। अर्थात किसी भी विषय वस्तु के प्रति अगर मनुष्य में सद्भावना हो तो उससे उनके ज्ञान का विकास होता है।
सामाजिक समरसता,समाज में शांति, समानता और सलामती का अहसास करवाता है। समाज में समरसता होती है तो लोग शांति से रह सकते हैं। सामाजिक समरसता संकीर्ण दायरे में रहकर नहीं सोचती। सामाजिक समरसता जात -पात ,धर्म संप्रदाय,क्षेत्र ,भाषा और कौम से ऊपर उठकर चलने की बात करती है।
साहस और सद्भावना से भरी हरिवंश राय बच्चन की चंद पंक्तियां-
“जाओ लाओ पिया, नदिया से सोन मछरी
पिया, सोन मछरी,पिया सोन मछरी
जिसकी है नीलम की आंखें
हीरे पन्ने की पांखें”
सुमित्रानंदन पंत ने देशभक्ति गीतों की रचना की है–
“जय जन भारत…जय जन भारत!
गुजराती साहित्य में दलित और गैर दलित सर्जकों ने भी दलित साहित्य का सृजन किया है। उन्होंने अपने सर्जन के माध्यम से दलित गैर दलित समाज को जोड़ने का भी प्रयास किया है। गैर दलित सर्जकों ने अपनी कलम से दलितों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की है। दलितों के दुःख दर्द को समझने का प्रयास किया है।
डॉ मीना कुमारी परिहार












