
वो कहना चाहें पर कह न सके
दर्द-ए-दिल भी सह न सके
फिर भी हवाओं को हाल-ए-दिल कह तो सके ।
हवाओं से पूछा तो हम भी रह न सके।
हम यादों को सीने से लगा बैठे
ये यादें जिंदगी में बन के रह गई एक अफसाना
— जो हम भी सह न सके।
कैसे कहें जज़्बात-ए-दिल
न वो …न हम…. किसी को …किसी से…. कह न सके।
इजहार-ए-मुहब्बत बस ! हवा हवाई
जब भी चली ये बसंत बहार…
हो जाए दिल बे-करार ।
न उन का न हमारा — ये खुदगर्ज जमाना
ये वक्त बे-दर्द बहुत बड़ा… इजहार-ए-मुहब्बत कर न सके
यूं ही बन के रह जाएगा….
ये वक्त … बन जाएगा एक दिन… एक अफ़साना।
राज-ए-दिल वो जाने या हम जाने
सदियों से… हर जन्म में
यूं ही तरस-तरस के रह गए
ये दो परवाने ।
—महेश शर्मा, करनाल












