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मंजिल और मुसाफ़िर

​सिर्फ सोचने से मंजिल के सपने सच नहीं होते,
चाहे कितना भी भाग लो, ये रास्ते कम नहीं होते।
हमारी ख्वाहिशों से भी तेज है इस वक्त की रफ़्तार,
जो बीत गया पल, उसके फिर कभी संगम नहीं होते।।

​अनजान मोड़ों पर अक्सर कुछ फरिश्ते मिल जाते हैं,
जो अजनबी होकर भी अपनों से बन जाते हैं।
पतझड़ सी इस उदास जिंदगी की सुनी राहों में,
वो हंस कर जीने की नई कोई राह दिखा जाते हैं।।

​माना कि अड़चनें आएँगी तुम्हारी हर एक राह में,
जंगल के सन्नाटों में अक्सर मुसाफ़िर भटक जाते हैं।
पर विश्वास रखना कि कभी रास्ते खत्म नहीं होते,
भले ही लोग मंजिल के पास आकर थक जाते हैं।।

​सामने खड़ी हो मंजिल, तो कदम अपने न मोड़ना,
मुश्किलों की जंजीरों को हिम्मत से तुम तोड़ना।
भले ही सामने खड़ी हो आँधियों की काली दीवार,
सर उठा के उस अंधेरे में भी अपना रास्ता खोजना।‌।

​नेकियों की खुशबू महकती रहे सदा तुमसे,
‘रजनी’ अब खुद को बस इंसानियत से जोड़ना।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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