
•~•~•~•~•~•~•~ (छायावाद से प्रभावित)
तरु वक्ष मिला, पुष्पित पल्लवित हे लता!
आंधी आए या तुफां,न छोड़ तूं संग सखा।
तरु वक्ष सटी रह,हवा सके न तुझे हरा।
छूटी डाल गिरते ही मिलेगी तुझे धरा।
जब तक है जीवन तेरा वृक्ष ये हरा-हरा।
प्रिय का भोग प्रेमजल, जो है हरा-भरा।
यूंही सौंदर्य-सुगंध बिखेरो जग में सदा।
गर्व कर अपनी किस्मत पर, हे लता !
तरु मिला तेरी किस्मत,मिला सदा सदा!
गत जन्म के कर्म का फल हुआ ये अदा।
नहीं आश्रय विहीन तूं , न इससे तूं जुदा।
तरे भाग्य में हर जन्म 'वर' ये ही है बदा।
झूम-झूम डाल में इसकी, उमंग से हर्षा।
वर्षाजल प्रेम का,बरसे भाग्य को सराह।नहीं अकेली जग,स्वामिनी-सा सुख पा।
झूमती-सी तितलियों को मधु से रिझा।
— महेश शर्मा, करनाल












