
कालों के भी काल हैं, महाकाल
जिनके ध्यान से मिट जाए हर काल
त्रिनेत्रधारी, है वो, है जटाजूटधारी,
गंगाजल बहता जिनकी लटों से भारी
शिव ही शून्य हैं, शिव ही साकार,
शिव हैं ब्रह्मांड के पालनहार।
त्रिनेत्र जिनके जलते अग्नि समान,
नयन खोलते ही हो प्रलय का गान।
ना सोने का सिंहासन, ना राजमहल,
शमशान में रहते, हैं सबके सकल।
त्याग ही उनका है आभूषण,
शिव हैं संन्यासी, शिव हैं पूजन।
डमरू की ध्वनि से गूंजे यह धरा,
नंदी के साथ झूमे शिव भोले हरि हरा
भस्म रमा तन पर, सजी त्रिशूल की छाया,
जिनका नाम लेते ही मिटे दुख की माया।
शिव है संहारक, शिव ही है सृष्टिकर्ता,
वैराग्य की वो मूरत, है अज्ञान के हरता।
ना है कोई आडंबर, ना हि कोई शोर,
मेरे भोले के दर पे बस प्रेम का जोर।
शुभ महाशिवरात्रि…..
हर हर महादेव…. ॐ
लेखिका – पल्लवी द्विवेदी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश













