
द्वार हृदय के अब तो खोलो |
मीठे स्वर में भी नित बोलो ||
रहे न बोली में कड़वाहट |
मन में मिश्री-सा रस घोलो ||
द्वार हृदय के अब तो खोलो।
घृणा-द्वेष से करो किनारा।
हो व्यवहार सदा ही प्यारा।
लेकिन धर्म – तराजू में तुम, |
मानवता को कभी न तोलो ||
द्वार हृदय के अब तो खोलो ||
काम करो अच्छाई के तुम।
साथ रहो सच्चाई के। तुम।
छल -फरेब का छोड़ अनुशरण,
साथ धर्म के अब तो हो लो |
द्वार हृदय के अब तो खोलो ||
हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख इसाई।
सभी एक क्यों बात भुलाई।
रंग खून का एक सभी का ,
भूलो मत समता बड़बोलो ।
द्वार हृदय के अब तो खोलो ||
समरसता की बात करो तुम |
नहीं किसी से घात करो तुम ||
मिलता है संतोष तभी जब,
सिद्धांतों से कभी न डोलो |
द्वार हृदय के अब तो खोलो
संतोष नेमा संतोष













